स्व अनुशासन से संभव है सच्चे सुख की प्राप्ति : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
बाह्य एवं आभ्यांतर तप को गुरुदेव ने किया व्याख्यायित

15.03.2026, रविवार, लाडनूं:
युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में सुधर्मा सभा में प्रतिदिन होने वाली योगक्षेम वर्ष व्याख्यान माला जन जन के अज्ञान का हरण कर अध्यात्म के आलोक से आलोकित कर रही है। एक और वहां जैन विश्व भारती का आगम सूक्तों का सरल विवेचन श्रोताओं के ज्ञान को वृद्धिंगत कर रहा है। प्रति सप्ताह चित्त समाधि शिविर के आयोजन से भी देशभर के लोग गुरू सन्निधि में अध्यात्म, ध्यान, योग से लाभान्वित हो रहे है। संत समुदाय का प्रेक्षाध्यान शिविर भी गतिमान है।
उत्तराध्ययन आगम का उल्लेख करते हुए युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि संसार में हर प्राणी की यह इच्छा होती है कि वह सुखी रहे और वह हमेशा दुखों के भय से डरता है। भगवान महावीर ने कहा है कि प्राणी दुख से डरते हैं और यह दुख स्वयं जीव ने ही अपने प्रमाद से पैदा किया है। जो बाहरी सुविधाएं या पदार्थ जन्य सुख मिलते हैं, वे तो उन परिस्थितियों या पदार्थों के चले जाने पर वियोग का कारण बनकर आदमी को फिर से दुखी बना देते हैं। इसलिए सच्चा सुखी बनने के लिए शास्त्रकार ने मार्गदर्शन दिया है कि आत्मा का दमन यानी नियंत्रण करो। हमारी आत्मा अमूर्त है, फिर उसका दमन कैसे करें? इसका उपाय है कि हम अपने मन पर कंट्रोल करें और अपनी इंद्रियों, बॉडी, माइंड, स्पीच और सेंसेज का संयम करें। मन और इंद्रियों का दमन करने से हमारी आत्मा का दमन अपने आप हो सकेगा और आत्मा में मौजूद विकृतियां दूर हो सकेंगी।
गुरूदेव ने आगे फरमाया कि जब हम संयम और बाह्य व आभ्यंतर तप की साधना करते हैं, तो आत्मानुशासन पुष्ट होता है। जिसमें स्वानुशासन अच्छी तरह जागृत हो जाता है, उसे दूसरों के या गुरु के अनुशासन की फिर आवश्यकता नहीं पड़ती है। वह गुरु के अनुशासन को कृत-कृत्य कर देता है। विपरीत परिस्थितियों में भी समता रखना, नंगे पाँव चलने जैसे बाह्य कष्टों को तप मानकर सहना और मन में विकल्पों के बजाय संकल्पों को पुष्ट करना ही सच्ची साधना है। जो व्यक्ति संयम और तप के द्वारा अपनी आत्मा का दमन कर लेता है, वह इस लोक में भी सुखी होता है और परलोक में भी परम शांति व सुख को प्राप्त करता है।




