सूरत के कपड़ा उद्योग पर संकट: महंगाई और मजदूरी समस्या से जूझते कारीगर, पलायन तेज
कमर्शियल गैस महंगी और मजदूरी में देरी से हालात बिगड़े; कई मजदूर भूखे रहने को मजबूर, राहत के लिए 40 रुपये में कम्युनिटी किचन शुरू

सूरत। देश की ‘सिल्क सिटी’ और ‘हीरे-धागों का शहर’ सूरत इस समय गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। कपड़ा उद्योग से जुड़े हजारों कारीगर महंगाई की मार, कमर्शियल गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और समय पर मजदूरी न मिलने के कारण बेहद कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने को मजबूर हैं।
स्थिति इतनी विकट हो गई है कि कई मजदूर परिवार पिछले दो-तीन दिनों से सिर्फ केले खाकर गुजारा कर रहे हैं। रसोई का चूल्हा जलाना उनके लिए चुनौती बन चुका है और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया है इसी बीच हालात से परेशान होकर उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य राज्यों के मजदूर बड़ी संख्या में अपने गांवों की ओर पलायन कर रहे हैं। रेलवे स्टेशनों और बस स्टैंडों पर लंबी कतारें इस संकट की गंभीरता को साफ दर्शाती हैं विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो सूरत का कपड़ा उद्योग, जो देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। कारीगरों के पलायन से उत्पादन ठप होने का खतरा भी बढ़ गया है।
हालांकि इस संकट के बीच राहत की एक किरण भी नजर आई है। सूरत प्रशासन और स्थानीय संस्थाओं ने मिलकर औद्योगिक क्षेत्रों में ‘कम्युनिटी किचन’ और ‘भोजन पार्सल सेवा’ शुरू की है, जहां मात्र 40 रुपये में कारीगरों को भरपेट, स्वच्छ और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है।
इस पहल का उद्देश्य उन मजदूरों को सहारा देना है जो महंगाई और गैस की समस्या के कारण शहर छोड़ने का मन बना चुके थे। फिलहाल यह व्यवस्था कुछ राहत जरूर दे रही है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए सरकार और उद्योग जगत को मिलकर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।



