व्यक्ति की आत्मा ही उसकी परम मित्र : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
- जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय प्रांगण में अनुशास्ता का स्वागत अभिनंदन- शांतिदूत से विद्यार्थियों ने स्वीकारा नशामुक्ति का संकल्प

14.02.2026, शनिवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामन (राजस्थान) :युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य से जैन विश्व भारती लाडनूं अध्यात्ममय आभा से आलोकित हो रहा है। गुरू सन्निधि में चतुर्विध धर्मसंघ धार्मिक आराधना, साधना द्वारा एक एक क्षण को उपयोगी बनाते हुए जानोपकर का कार्य कर रहे हैं। इस मौके पर जैन विश्व भारती संस्थान (मान्य विश्वविद्यालय) भी अनुशास्ता की सन्निधि से कृतार्थ हो रहा है। आज जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय के प्रांगण में अनुशास्ता का वृहद स्वागत समारोह भी आयोजित हुआ। जिसमें संस्थान के सदस्यों सहित विद्यार्थियों, शिक्षकों ने आराध्य के स्वागत में प्रस्तुति दी।

विश्वविद्यालय के प्रांगण में गुरूदेव ने विशेष प्रवचन कार्यक्रम में नैतिकता, सद्भावना और नशामुक्ति का प्रेरक संदेश दिया। अपने उद्बोधन में उन्होंने ने कहा कि वर्तमान समय में मानव जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता नैतिक मूल्यों की पुर्नस्थापना है। नैतिकता ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को सुदृढ़ बनाती है। आचार्यश्री ने उपस्थित शिक्षकों, विद्यार्थियों और नागरिकों को जीवन में ईमानदारी, संयम और सद्भावना को अपनाने का आह्वान करते हुए नशामुक्त जीवन का संकल्प भी करवाया।

इस अवसर पर आचार्यप्रवर ने विद्यार्थियों से कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी में ज्ञान का विकास, संस्कार निर्माण व आत्मनिर्भरता का विकास होना चाहिए। उन्होनें संस्थान के पाठ्यक्रर्मो की चर्चा करते हुए कहा कि जैन विश्वभारती संस्थान सामान्य संस्थान नहीं होकर जैन धर्म के धर्माचार्यो से जुड़ा विशिष्ट संस्थान है, इसलिए यहां प्रत्येक व्यक्ति में नैतिकता, ईमानदारी व मूल्य जुड़े होने चाहिए।
कार्यक्रम में कुलपति प्रो. बच्छराज दूगड ने संस्थान की शैक्षणिक व आध्यात्मिक गतिविधियों की जानकारी देते हुए आचार्यश्री महाश्रमण का भावपूर्ण स्वागत किया। कार्यक्रम में मुख्यमुनि श्री महावीर कुमार, मुनिश्री कुमारश्रमण, मुनिश्री योगेश कुमार, प्रोफेसर दामोदर शास्त्री आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. युवराज सिंह खंगारोत ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शिक्षकगण, श्रावक-श्राविकाएं और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

मुख्य प्रवचन के अंतर्गत सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि दुनिया में मित्र भी होते हैं। एक आदमी के अनेक मित्र भी हो सकते हैं। मित्रों के साथ वार्तालाप, हंसी-मजाक, भोजन-पानी, घूमना-फिरना, यात्रा आदि अनेक उपक्रम होते हैं, किन्तु वे मित्र पराए मित्र होते हैं। शास्त्रकार ने बताया कि हे पुरुष! तुम ही तुम्हारे मित्र हो, फिर बाहर किसे खोजते हो। मित्र दो प्रकार हो सकते हैं- एक परम मित्र और दूसरा एक अपरम मित्र। एक बहुत उत्कृष्ट कोटि का परम मित्र है और दूसरे जो बाहर मित्र बनाए जाते हैं, वे अपरम मित्र की कोटि में आते हैं। प्रश्न हो सकता है कि आदमी का परम मित्र कौन है? उत्तर दिया गया कि तुम ही तुम्हारे परम मित्र हो अर्थात् मनुष्य की आत्मा ही उसकी परम मित्र होती है। परम मित्र कोई बन सकता है तो वह उस व्यक्ति की स्वयं की आत्मा हो सकती है। उस उच्च कोटि में कोई संसारी व्यक्ति नहीं आ सकता। परम मित्र अपनी आत्मा ही होती है।

एक प्रश्न यह भी हो सकता है कि आत्मा को मित्र कैसे बनाया जा सकता है? आत्मा को परम मित्र बनाने के लिए आदमी को अपने भीतर गुणात्मक विकास करना आवश्यक है। हमारी आत्मा जहां मित्र बन सकती है तो वह शत्रु की भूमिका भी अदा कर सकती है। सुख और दुःख की कर्ता और उसका क्षय करने वाली व्यक्ति की स्वयं की आत्मा ही होती है। आत्मा मित्र भी है और आत्मा शत्रु भी होती है।
तत्पश्चात मुनि जंबू कुमार जी (सरदारशहर), मुनि देवेंद्र कुमार जी, मुनि आर्जव कुमार जी ने भावभीव्यक्ति दी।


