संवर का विकास आत्मा के लिए श्रेयस्कर : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
-मार्ग में अजमेर रेंज के आईजी ने आचार्यश्री के दर्शन कर प्राप्त किया आशीष

-करीब 12 कि.मी. का विहार कर आचार्यश्री पहुंचे खोखर गांव
-राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में हुआ पावन प्रवास
-14 जनवरी को संगमरमर नगरी मकराना में पधारेंगे तेरापंथाधिशास्ता
13.01.2026, मंगलवार, खोखर, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) :राजस्थान के नवनिर्मित जिले डीडवाना-कुचामण की धरा पर जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ गतिमान हो चुके हैं। इस नवीन जिले का सौभाग्य कि वर्ष 2026 के तेरापंथ धर्मसंघ समस्त महनीय आयोजन इसी जिले की धरा पर समायोजित होंगे। इसके साथ ही महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी इस जिले में ही स्थित लाडनूं के जैन विश्व भारती में लगभग तेरह महीनों का योगक्षेम वर्ष का महामंगल प्रवास भी सुसम्पन्न करेंगे। इस वर्ष के तेरापंथ धर्मसंघ का प्रथम महनीय आयोजन वर्धमान महोत्सव के रूप में बोरावड़ में 15-17 जनवरी को आयोजित होगा। इसके उपरान्त त्रिदिवसीय मर्यादा महोत्सव का आयोजन 23-25 जनवरी को छोटी खाटू की धरा पर समायोज्य है। तदुपरान्त युगप्रधान, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ 6 फरवरी को जैन विश्व भारती के परिसर में योगक्षेम वर्ष के लिए पावन प्रवेश करेंगे।

इसके पूर्व मंगलवार को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी परबतसर से खोखर के लिए गतिमान हुए। मार्ग में एक स्थान पर सैनिक स्कूल के विद्यार्थियों ने आचार्यश्री के दर्शन किए तो आचार्यश्री ने उन्हें मंगल पाथेय प्रदान करने के साथ-साथ नशामुक्ति का संकल्प भी स्वीकार कराया। इसी प्रकार मार्ग में ही अजमेर रेंज के आई.जी. श्री राजेन्द्र सिंह ने भी आचार्यश्री के दर्शन किए तो आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। आचार्यश्री लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर खोखर में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। 14 जनवरी को तेरापंथाधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी संगमरमर नगरी मकराना में पधारेंगे।

विद्यालय परिसर में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्र में उपस्थित जनता को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन आगमों में नौ पदार्थों का उल्लेख मिलता है। इन्हें तत्त्व भी कहा जाता हैं। इनमें पांचवा तत्त्व होता है-आश्रव। आश्रव ही समस्त पाप कर्मों के बंध कराने का हेतु है। आश्रव से पाप कर्मों का बंध तो होता ही है, पुण्य कर्म का बंधन कराने में भी आश्रव का योगदान होता है। पुण्य के बंध को एक बार छोड़ दें तो पाप कर्म का बंध भी विचारणीय लगता है। हिंसा करना, झूठ बोलना, चोरी करना ये सभी आश्रव है। इन आश्रवों को संवर के माध्यम से जीता जा सकता है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि संसार का कारण आश्रव और मोक्ष का कारण संवर होता है। यह एक दर्शन है।

आदमी को हिंसा, चोरी, झूठ से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को संकल्पता हिंसा से विशेष रूप से बचने का प्रयास होना चाहिए। हिंसा रूपी आश्रव से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को झूठ से भी बचने का प्रयास होना चाहिए। गृहस्थ भी अपने जीवन में हिंसा, चोरी और झूठ से बचने का प्रयास करना चाहिए। संवर की साधना जितनी पुष्ट होगी, आश्रव से बचा जा सकता है। जीवन में संवर का विकास हो, यह आत्मा के लिए श्रेयस्कर होता है। खोखर की जनता की ओर से सरपंच प्रतिनिधि श्री जगदीश खोखर, श्री चुन्नारामजी व श्री सुरेशचन्द्र व्यास ने भी आचार्यश्री का स्वागत करते हुए अपनी भावाभिव्यक्ति दी।




