धर्मराजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

आचार पंचक के प्रति बनी रहे सजगता व निष्ठा : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

-चतुर्दशी के संदर्भ में आचार्यश्री ने बोरावड़वासियों को दिखाया हाजरी का अप्रतिम नजारा

 -वर्धमान महोत्सव का शिखर दिवस-साध्वीप्रमुखाजी ने भी बोरावड़वासियों को किया उत्प्रेरित

-भावविभोर बोरावड़वासियों ने दी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति

17.01.2026, शनिवार, बोरावड़, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) :वर्धमान महोत्सव का अंतिम तथा शिखर दिवस। ‘वर्धमान समवसरण’ में उपस्थित विशाल जनमेदिनी। मंच के दोनों ओर विराजमान साधु-साध्वियों की उपस्थिति और उनके मध्य जब तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी विराजमान हुए तो पूरा पण्डाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा। आचार्यश्री के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ वर्धमान के तीसरे व अंतिम दिवस के मुख्य कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। संसारपक्ष में बोरावड़ से संबद्ध साध्वी मृदुलयशाजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। गुरुकुलवासी मुनिवृंद ने गीत का संगान किया। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने वर्धमान महोत्सव के अंतिम दिवस पर समुपस्थित जनता को अभिप्रेरित किया।

वर्धमान महोत्सव के अंतिम दिवस पर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आज वर्धमान महोत्सव का तीसरा दिन है और चतुर्दशी तिथि भी है। चतुर्दशी का दिन हाजरी के रूप में प्रतिष्ठापित है। हाजरी का प्रथम वाक्य है-सर्व साधु-साध्वियां पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की अखण्ड आराधना करें।’ यह एक वाक्य सम्पूर्ण साधुचर्या को अपने आप में समेटे हुए है। इसका पालन होता है तो साधुचर्या परिपुष्ट बनी रहती है। इसके पालन मात्र से साधुपन बना रहता है। चित्त में समाधि रहे और अपने ज्ञान आचार, दर्शन, आचार, चारित्र आचार, तप आचार और वीर्य आचार- इस आचार पंचक के प्रति निष्ठा और सजगता रहे तो फिर सहजानंद की स्थिति बन सकती है। संगठन की अपनी व्यवस्थाएं होती हैं। संगठन व संप्रदाय भी साधना में सहायक बनता है। संगठन की अपनी मर्यादाएं भी अपेक्षित हो सकती हैं। एक ओर आचार तो दूसरी ओर त्याग की बात भी होती है। आचार और विचार के साथ सांगठनिक मर्यादा की बात भी होती है। मर्यादाएं संगठन को सुरक्षित और व्यवस्थित रखने में बहुत उपयोगी होती हैं। एक मर्यादा है- सर्व साधु-साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहें। विहार चतुर्मास आचार्य की आज्ञा से करें। अपना-अपना शिष्य-शिष्याएं न बनाएं। आचार्य भी योग्य व्यक्ति को दीक्षित करें और दीक्षित करने पर भी कोई अयोग्य निकले तो उसे गण से अलग कर दें। आचार्य अपने गुरुभाई या शिष्य को अपना उत्तराधिकारी चुनें, उसे सर्व साधु-साध्वियां सहर्ष स्वीकार करें।

ये मर्यादाएं तेरापंथ संगठन की पिलर्स मर्यादाएं हैं। इनमें भी सर्वश्रेष्ठ मर्यादा है-सर्व साधु-साध्वियां एक आचार्य की आज्ञा में रहें। साधु जीवन को प्राप्त कर लेना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। इस जीवन में चित्त में समाधि, शांति रहे और परस्पर अच्छा व्यवहार रहे।चतुर्विध धर्मसंघ ने आचार्यश्री के मुखारविंद के लुंचन की निर्जरा के संदर्भ में वंदन करते हुए निर्जरा में सहभागी बनाने की प्रार्थना की तो साधु, साध्वियों व समणियों के लिए आधा-आधा आगम स्वाध्याय व मुमुक्षु व श्रावक-श्राविकाओं के लिए तीन-तीन अतिरिक्त सामायिक करने प्रेरणा प्रदान की। चतुर्दशी के संदर्भ में आचार्यश्री के समक्ष साधु-साध्वियों व समणियों ने प्रवचन पण्डाल में पंक्तिबद्ध होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। यह दृश्य बोरावड़वासियों को आह्लादित करने वाला था।

बोरावड़ तेरापंथी सभा के अध्यक्ष श्री नेमिचंद गेलड़ा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय तेरापंथी सभा व तेरापंथ युवक परिषद के सदस्यों ने सामूहिक गीत का संगान किया। तेरापंथ किशोर मण्डल-बोरावड़ के संयोजक श्री गौरव बोथरा, श्री चैनरूप बोथरा, श्री विवेक गेलड़ा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्री कमल छाजेड़ ने गीत का संगान किया। पार्षद गजेन्द्र बोथरा, नागौर देहात की भाजपा जिलाध्यक्ष श्री सुनीता राझंण ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मण्डल-बोरावड़ अणुव्रत के संकल्पों का पत्र आचार्यश्री के चरणों में समर्पित की। श्री रवि छाजेड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी।

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