सहन करो सफल बनो : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण
-बगड़ीनगर से गतिमान हुए ज्योतिचरण, किया 14 कि.मी. का व-चण्डावल गांव पूज्यचरणों से बना पावन-आचार्यश्री ने गुस्से से बचने हेतु किया अभिप्रेरित

🌸30.12.2025, मंगलवार, चण्डावल, पाली (राजस्थान) :एक दिवसीय प्रवास कर और श्रद्धालुओं को आध्यात्मिकता से भावित कर मंगलवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ बगड़ी नगर से गतिमान हुए। आचार्यश्री ने बगड़ी नगर के उस प्राचीन बड़ के पेड़ के पास भी पधारे जहां आचार्यश्री भिक्षु स्वामी ने द्रव्य दीक्षा ग्रहण की थी। बगड़ीवासियों ने अपने आराध्य के समक्ष अपने कृतज्ञ भाव अर्पित किए। जनता को मंगल आशीष प्रदान करते हुए अगले गंतव्य की ओर बढ़ चले। सर्दी के मौसम में भी आचार्यश्री की पदयात्रा लोगों को प्रेरणा प्रदान कर रही थी। आज पाली जिले में आचार्यश्री की इस बार की यात्रा का अंतिम दिवस भी था। लगभग 27 दिनों की यह यात्रा में जिले में मानों आध्यात्मिकता का प्रभाव बना रहा।

आचार्यश्री लगभग चौदह किलोमीटर का विहार कर चण्डावल गांव में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि शास्त्र में बताया गया है कि क्रोध, अहंकार, माया और लोभ आदमी का नुक्सान करने वाले तत्त्व है। गुस्सा प्रीति को समाप्त कर देता है। अहंकार विनय का नाश कर देता है। माया मित्रता का नाश कर देती है। लोभ तो मानों सबकुछ नष्ट करने वाला होता है।
आदमी को गुस्सा आता है। गुस्सा को मानव के लिए शत्रु कहा गया है। इसका हमेशा परित्याग रखने का प्रयास करना चाहिए। जितना संभव हो सके आदमी गुस्से से बचने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को आवेश आना भी एक प्रकार की दुर्बलता होती है। गुस्से को मनुष्यों का एक शत्रु कहा गया है। कोई गुस्सा करता है तो उसका चेहरा भी मानों विकृत-सा हो जाता है। आदमी गुस्से से दूर रहने और क्षमा की भावना का विकास करने तथा सहन करने को प्रयास करना चाहिए। कहा भी जाता है कि सहन करो सफल बनो।

आक्रोश अथवा गुस्से से बचने का प्रयास करना चाहिए। मन में आवेश नहीं आना चाहिए। आचार्यश्री तुलसी ने क्रोध को नशे की भांति माना। इस संदर्भ में आचार्यश्री तुलसी द्वारा रचित गीत का आचार्यश्री ने आंशिक संगान किया। आदमी के भीतर क्षमा का भाव होना चाहिए। क्षमा की साधना जीवन में बढ़ती है तो जीवन उतना शांतिमय बन सकता है। गुस्सा नीची वृत्ति और क्षमा बहुत ऊंची वृत्ति है। आदमी को अपने भीतर क्षमा के भाव का विकास करना चाहिए। जीवन में समता का प्रयास करना चाहिए।आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त चण्डावल के सरपंच श्री भाटियाजी ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति देते हुए मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया।




