धर्मराजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

लोभ से बचने व संतोष को धारण करने का हो प्रयास : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

भिक्षु चेतना वर्ष का महाचरण सुसम्पन्न कर गतिमान हुए ज्योतिचरण

 -लगभग 7 कि.मी. का विहार कर आचार्यश्री पहुंचे मुसालिया

-मुसालियावासियों ने अपने आराध्य का किया भावभीना अभिनंदन

–मुसालियावासियों ने दी भावनाओं को अभिव्यक्ति, प्राप्त किया मंगल आशीष

-पुनः 6 कि.मी. का विहार कर सोजत रोड पधारे युगप्रधान आचार्यश्री

28.12.2025, रविवार, मुसालिया, पाली (राजस्थान) :आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अंतर्गत ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के तेरह दिवसीय महाचरण का आयोजन महामना भिक्षु की जन्मस्थली कंटालिया में सुसम्पन्न करने के उपरान्त रविवार को प्रातः जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी कंटालिया से गतिमान हुए। कंटालियावासियों ने अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता अर्पित की। आचार्यश्री ने आशीष प्रदान करते हुए अगले गंतव्य की ओर गतिमान थे। आज आचार्यश्री मुसालिया की ओर प्रवर्धमान थे।

लगभग सात किलोमीटर का विहार कर युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी मुसालिया गांव के निकट जैसे ही पधारे तो अपने आराध्य की प्रतीक्षा में बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण अभिनंदन किया। स्वागत जुलूस के रूप में आचार्यश्री अपनी धवल सेना संग मुसालिया गांव में स्थित ओसवाल पंचायत भवन में पधारे।

ओसवाल पंचायत भवन में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित श्रद्धालु जनता को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन संबोध प्रदान करते हुए कहा कि आदमी के भीतर अनेक वृत्तियां होती हैं। आदमी के भीतर गुस्सा, अहंकार, माया, लोभ आदि की वृत्ति होती है। किसी आदमी में उनकी अधिकता या कमी की बात हो सकती है, लेकिन उन वृत्तियों की सत्ता बनी रहती है। उन वृत्तियों में एक लोभ की ऐसी वृत्ति है जो अन्य वृत्तियों के समाप्त हो जाने के बाद भी बनी रहती है। लोभ को पाप का बाप कहा जाता है। बहुत से पापों का कारण लोभ ही होता है। आदमी के मन में लालसा और कामना हो जाती है। वह कामना भौतिक पदार्थों की अथवा भौतिक उपलब्धियों की होती है तो वह कामना दुःख का कारण भी बनती है। कामना को शल्य कहा गया है। कामना की चुभन कष्टदायी हो सकता है।

इसलिए आदमी को अपनी कामनाओं को संतुलित करने का प्रयास करना चाहिए और अपने जीवन में जितना संभव होना चाहिए, संतोष को धारण करने का प्रयास करना चाहिए। पंडित और ज्ञानी आदमी होता है, वह अपने जीवन में संतोष का धारण कर लेता है। संतोष को परमसुख कहा गया है। हालांकि संतोष और असंतोष का विवेक भी होना चाहिए। स्वदार, भोजन व धन में संतोष तथा अध्ययन, जप और दान में संतोष नहीं करना चाहिए। इसलिए संतोष कहां रखना और नहीं रखना उसका भी विवेक होना चाहिए।

आचार्यश्री ने कहा कि कुछ वर्षों के बाद कंटालिया के बाद मुसालिया आना हुआ है। यहां के लोगों मंे अच्छी धर्म की भावना बनी रहे। तदुपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने भी जनता को उद्बोधित किया। अपनी संसारपक्षीय भूमि में साध्वी सिद्धार्थप्रभाजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। श्री रमेशचन्द्र बोहरा, श्रीमती उषा बोहरा, श्री अशोक बोहरा, श्री महावीर पीपाड़ा, श्री दर्शन बोहरा, श्रीमती संगीता बोहरा, सिरवी समाज की ओर से श्री जोधारामजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। स्थानीय तेरापंथ महिला मण्डल ने गीत का संगान किया।

दोपहर लगभग ढाई बजे आचार्यश्री ने मुसालिया से मंगल प्रस्थान किया। लगभग छह किलोमीटर का विहार कर युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी रात्रिकालीन प्रवास हेतु सोजत रोड में पधारे। आचार्यश्री का रात्रिकालीन प्रवास सोजत रोड में स्थित तेरापंथ भवन में हुआ। इसलिए प्रकार आचार्यश्री ने एक दिन में लगभग तेरह किलोमीटर का विहार परिसम्पन्न किया।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button