ज्ञान के आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम है वचन : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
भिक्षु चेतना वर्ष महाचरण : 12वें दिन आचार्यश्री भिक्षु की वचन संपदा का हुआ वर्णन

-कंटालिया ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने दी भावपूर्ण अभिव्यक्ति, प्राप्त किया आशीष
-कंटालिया के श्रद्धालुओं ने भी श्रीचरणों में अर्पित की अपनी अभिव्यक्ति
26.12.2025, शुक्रवार, कंटालिया, पाली (राजस्थान) :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता महामना भिक्षु स्वामी की जन्मस्थली कंटालिया की धरा पर आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष अर्थात् ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण का भव्य आयोजन निरंतर प्रवर्धमान है।

शुक्रवार को ‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण का बारहवां दिन का आयोजन रावले में बने ‘भिक्षु समवसरण’ में वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में प्रारम्भ हुआ। समणीवृन्द ने गीत का संगान किया। आज के निर्धारित विषय ‘आचार्य भिक्षु की वचन संपदा’ पर साध्वी चारित्रयशाजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी।
महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि अहिंसा, संयम और तप रूपी धर्मों की जानकारी देने का सबसे सक्षम और सशक्त माध्यम है वचन। वचन के द्वारा हम दूसरों को ज्ञान प्रदान करने का प्रयास कर सकते हैं। तीर्थंकर भगवान प्रवचन के माध्यम से ही पूरी दुनिया को प्रतिबोध देते हैं, उसके लिए वे अपनी वाणी का प्रयोग करते हैं। उनकी वाणी के प्रभाव से कितने-कितने लोगों को संसार रूपी सागर से पार होने का मार्गदर्शन प्राप्त हो सकता है। आदमी को उद्धार की दिशा में आगे बढ़ाने वाला तत्त्व वचन होता है।

वचन का उपयोग चार रूपों में किया जा सकता है- पहला प्रकार है परिषद में व्याख्यान अथवा प्रवचन देना। दूसरा उपयोग होता है कि वचन का बातचीत का प्रयोग करना। कोई पूछे तो उसे बताना अर्थात् वार्तालाप के रूप में वचन का उपयोग हो सकता है। तीसरी बात बताई गई कि वचन का प्रयोग गीत के संगान में भी किया जा सकता है। चौथी बात मंगलपाठ सुनाने आदि के संदर्भ में भी वचन का उपयोग हो सकता है।
जिनके पास अच्छी वाणी है, उन्हें औचित्यानुसार अपनी वाणी शक्ति का अथवा वचन शक्ति का उपयोग करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री महाप्रज्ञजी की भाषा शैली कितनी शुद्ध होती थी। आदमी कोई भाषण दे तो आदमी को वैसी भाषा में और वैसा ही बोलना चाहिए कि सुनने वाले को समझ में आए। अवगुणात्मक बातों से यथासंभव बचने का प्रयास करना चाहिए। वाणी से कटुतापूर्ण शब्दों से बचने का प्रयास करना चाहिए। व्याख्यान ऐसा होना चाहिए कि जिसे सुनकर लोगों को अच्छा आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो सके। निर्धारित समय पर प्रवचन आदि आरम्भ करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री भिक्षु की वचन संपदा इतनी अच्छी थी कि जो भी आता बिना प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। उनका वचन बहुत ही प्रभावशाली था। उनकी बात को स्वीकार कर लोग तैयार रहते थे। वैसे किस प्रकार चर्चा-वार्ता करते थे। किसी घटना प्रसंग का कितनी सरलता से समझाते थे। स्वयं की वचन संपदा पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। हम सभी की वचन संपदा अच्छी रहे, यह काम्य है।

मंगल प्रवचन के उपरान्त मुनि पारसकुमारजी ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला प्रशिक्षिका सुनीता सोलंकी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। राज परिवार की ओर से सुश्री हिमाद्रि कुमारी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। बालिका आरोही व सारा सेठिया ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी। श्रीमती मंजू डागा अपने परिवार की महिलाओं के साथ गीत का संगान किया। श्रीमती राजश्री डागा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। ज्ञानशाला-कंटालिया के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। ज्ञानशाला प्रशिक्षिकाओं ने गीत का संगान किया। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों को आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद के पूर्व अध्यक्ष श्री रमेश डागा, श्री गौतम डागा, श्रीमती सपना श्रीश्रीमाल, श्री अमृत डागा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। श्री महेन्द्र सिंघी व श्री मदनलाल मरलेचा ने पृथक्-पृथक् गीत को प्रस्तुति दी। श्री जबरसिंह ने अपनी अभिव्यक्ति दी



