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स्वयं सत्य के अन्वेषण का हो प्रयास : अध्यात्मवेत्ता आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्यश्री के मंगल सन्निधि में साध्वी विनयश्रीजी की स्मृतिसभा का हुआ आयोजन

-14 किलोमीटर का विहार कर महातपस्वी आचार्यश्री पहुंचे टीडी

-राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पूज्यचरणों से बना पावन

-22.11.2025, शनिवार, टीड़ी, उदयपुर (राजस्थान) :जन मानस को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति का संदेश देते हुए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी वर्तमान में राजस्थान के उदयपुर जिले में गतिमान हैं। सर्दी का असर इन क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई दे रहा है। सर्द हवाएं व कोहरा सर्दी के प्रभाव को दर्शा रहा है, किन्तु दिन में सूर्य का आतप मानों सर्दी के प्रभाव को नगण्य-सा कर दे रहा है। मौसम की अनुकूलता-प्रतिकूलता से अप्रभावित आचार्यश्री महाश्रमणजी जनकल्याण के निरंतर गतिमान हैं।

शनिवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अगले गंतव्य की ओर प्रस्थान किया तो कोहरे का असर दिखाई दे रहा था। सुबह सूर्य की किरणें भी अलसाई-सी प्रतीत हो रही थीं। इस कारण सर्दी का प्रभाव अधिक दिखाई दे रहा था। मार्ग में अनेक स्थानों पर दर्शन करने वाले लोगों को मंगल आशीष प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी लगभग 14 किलोमीटर का विहार कर टीड़ी गांव स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।

विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि आदमी को स्वयं सत्य का अन्वेषण करने का प्रयास करना चाहिए और सभी प्राणियों के साथ मैत्री का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। सत्य की खोज करने वाला व्यक्ति सत्य की प्राप्ति की दिशा में आगे भी बढ़ सकते हैं। जहां शोध की दृष्टि होती है, वहां नया ज्ञान भी प्राप्त हो सकता है। कितनी चीजें खोज के द्वारा प्राप्त हुई होंगी। एक खोज इन्द्रियों के आधार पर होता है तो कुछ भीतर से भी हो सकता है। अतिन्द्रिय ज्ञान बिना इन्द्रियों के सहयोग के प्राप्त हो जाता है। बाहर से और इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान एक कुण्ड के पानी के समान होता है और भीतर से प्राप्त होने वाला ज्ञान कुएं के पानी के समान होता है, जिसका स्रोत हमेशा बना रहता है।

आदमी को अपने जीवन में पुनर्जन्म व पुण्य-पाप के फल की बात को मान कर ही जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। धर्म के रास्ते पर चलने आत्मा का कल्याण हो सकता है, जीवन भी शांति में व्यतीत हो सकता है। इसलिए आदमी को सबके साथ मैत्री का भाव रखने का प्रयास और स्वयं सत्य का अन्वेषण करने का प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में दिवंगत साध्वीश्री विनयश्रीजी की स्मृतिसभा का आयोजन हुआ। आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के ऊर्ध्वारोहण की मंगलकामना की। आचार्यश्री के साथ चतुर्विध धर्मसंघ ने चार लोगस्स का ध्यान भी किया। तदुपरान्त मुख्यमुनिश्री व साध्वीप्रमुखाजी ने भी उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक मंगलकामना की। विद्यालय परिवार की ओर से श्री सुनील सिंघवी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने उन्हें मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।

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