साध्वी श्री त्रिशला कुमारी जी के सान्निध्य में पदराडा़ में तेरापंथ दर्शन कार्यशाला का हुआ सफल आयोजन

आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के उपलक्ष में महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या साध्वी श्री त्रिशलाकुमारीजी के सान्निध्य में तेरापंथ दर्शन कार्यशाला का आयोजन पदराडा़ में हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ स्थानीय महिला मण्डल द्वारा मंगलाचरण से हुआ।
इस अवसर पर साध्वी श्री त्रिशलाकुमारीजी ने फरमाया कि आचार्य भिक्षु की यात्रा आचारनिष्ठा एवं सत्यनिष्ठा से प्रारम्भ हुई, जितना संघर्ष आचार्य भिक्षु को झेलना पड़ा उतना शायद ही किसी व्यक्ति को संघर्ष का सामना करना पड़ा होगा। इतने संघर्ष के बाद भी उनका लक्ष्य था ‘आत्मा रा कारज सारस्यां-मर पूरा देस्यां’। उनको कई वर्षों तक तो जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक साम्रगी जैसे रोटी, कपडा और मकान भी पर्याप्त मात्रा में नहीं मिले । उनका पहला प्रवास जहां व्यक्ति का अन्तिम प्रवास (श्मशान) होता है वहां हुआ। आचार्य भिक्षु आचार के पालन में बड़े सजग थे। कुछ साधु-साध्वियों में आचार शिथिलता दिखाई दी तो उसके कारण उनके साथ सम्बन्ध विच्छेद कर दिया। साध्वी श्री जी ने आचार्य श्री भिक्षु की लौकिक और लोकोत्तर धर्म की परिभाषा का सुंदर विश्लेषण किया। पुण्य का स्वतंत्र बंध नहीं होता आदि कई विषयों पर प्रेरक उद्बोधन प्रदान किया। साध्वी रश्मिप्रभाजी ने मधुर गीतिका के माध्यम से सारी जनता को भाव-विभोर कर दिया।

उपासक सुरेश बाफना ने कहा कि तेरापंथ धर्मसंघ द्वारा जैन धर्म को एक नई पहचान मिली है। और इसकी विश्वधर्म बनने की संभावना है क्योंकि तेरापंथ का एक आचार, एक विचार, एक संव्यवहार, एक गुरु और एक विधान है। इसके साथ तेरापंथ के मुख्य सिद्धांत त्याग धर्म, भोग अधर्म आदि बिन्दुओं की व्याख्या की। अन्त में कहा कि हमें अपने सम्यक्त्व को सुरक्षित रखने के लिए तेरापंथ के सिद्धातों को समझकर जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। आभार ज्ञापन सुरेश बाफणा ने किया। कार्यक्रम का कुशल संयोजन साध्वी कल्पयशाजी ने किया। इस कार्यशाला में पदराडा़, सेमड़, सायरा, नान्देशमा, रावलिया और गोगुन्दा के भाई-बहनों ने बड़े उत्साह से भाग लिया। कार्यशाला सफल एवं प्रभावक रही।




