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ईमानदारी की भावना का हो विकास : युगप्रधान आचार्यश्री

महाराणा प्रताप की भूमि पर महातपस्वी महाश्रमण

-10 कि.मी. का विहार कर बिछीवाड़ा में पधारे आचार्यश्री महाश्रमण*

-विद्या निकेतन माध्यमिक विद्यालय पूज्यचरणों से बना पावन,

17.11.2025, सोमवार, बिछीवाड़ागरपुर (राजस्थान)गुजरात की धरा को आध्यात्मिकता की ज्ञानगंगा अभिसिंचन प्रदान करने के उपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ राजस्थान की सीमा में गतिमान हो चुके हैं। अब आचार्यश्री राजस्थान के मेवाड़ संभाग के जनमानस को आध्यात्मिक ज्ञान रूपी गंगा से अभिसिंचन प्रदान करेंगे। आचार्यश्री के स्वागत में मानों श्रद्धालु भी उत्साह के साथ पहुंच रहे हैं। राजस्थान प्रवेश के साथ ही मौसम में भी परिवर्तन नजर आने लगा है। गुजरात की सीमा में जहां प्रायः ठंड का उतना प्रभाव नहीं दिखाई दे रहा था, किन्तु राजस्थान प्रवेश के साथ ही मानों मौसम में परिवर्तन दिखाई दे रहा है। अब ठंड का प्रभाव भी दिखाई दे रहा है।

सोमवार को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रातःकाल की मंगल बेला में अगले गंतव्य की ओर गतिमान हुए। जन-जन को मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए आचार्यश्री आगे बढ़ रहे थे। लगभग दस किलोमीटर का विहार कर शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी बिछीवाड़ा में स्थित विद्या निकेतन माध्यमिक विद्यालय में पधारे, जहां विद्यालय से संबंधित लोगों ने आचार्यश्री का भावपूर्ण स्वागत किया।

विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि जैन धर्म में अठारह पाप बताए गए हैं। इनमें तीसरा पाप है-अदत्तादान। अदत्तादान का अर्थ है- चोरी। जो वस्तु जिसे नहीं दी गई है और कोई उसे उठा ले, बिना बताए उस सामान को ले लिया, वह चोरी होती है। चोरी को पाप बताया गया है। आदमी लोभ के कारण से भी चोरी कर सकता है। किसी वस्तु के प्रति आदमी में लोभ व मोह होता है तो वह चोरी कर लेता है। चोरी भी पाप है। इसके लिए आदमी को अपने भीतर ईमानदारी के भाव का विकास करने का प्रयास करना चाहिए। ईमानदारी एक सर्वोत्तम नीति होती है। जो आदमी ईमानदारी रखता है, उसके प्रति इज्जत का भाव स्वतः ही आ जाता है और उसके प्रति विश्वास के भाव का विकास भी हो जाता है। ईमानदारी आदमी से मानों अभयता भी प्राप्त हो जाती है। दूसरे की चीजों को उठाने से अथवा जिस पर अपना कोई अधिकार नहीं, उसे छलपूर्वक चुरा लेने से पाप कर्म का ही बंध होता है।

आदमी को अपने जीवन में नैतिकता, प्रमाणिकता व सच्चाई के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए। ईमानदारी की भावना बहुत बड़ी बात होती है। आदमी का दृष्टिकोण ईमानदारी के प्रति रखने का प्रयास करना चाहिए। ईमानदारी सभी के लिए आवश्यक है। ईमानदारी एक पवित्र चीज है। आदमी बेईमानी से बचे और ईमानदारी का पालन करे, यह काम्य है।

आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज यहां आना हुआ है। यहां के सभी लोगों में आध्यात्मिक-धार्मिक विकास हो, विद्यालय के बच्चों में भी ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कारों का विकास होता रहे। विद्यालय के प्रिंसिपल श्री हरिश शर्मा ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री बाबूलाल कोठारी, श्री धनपालजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

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