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विचारों को शांत करने के लिए श्वांस पर ध्यान केन्द्रित करें-आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा.

28 सितम्बर 2025, आत्म भवन, बलेश्वर, सूरत।
आज प्रातःकाल से ही रिमझिम बारिश का दौर था,रविवार का दिन होने से स्थानीय श्रद्धालुओं के अलावा मुंबई,पूना,बैंगलोर, अमरोली, बारडोली से भी श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए। आचार्य श्री जी ने ध्यान के प्रयोग के साथ मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
आचार्य सम्राट डॉ.श्री शिवमुनि जी म.सा. ने ध्यान की एकाग्रता एवं विचारों को उपशांत करने की विधि बताते हुए फरमाया कि आत्मा का स्वभाव देखना और जानना है। ध्यान की स्थिति में बैठते हुए आते-जाते श्वांस को देखें और जानें। धीरे-धीरे विचार शांत, मन शांत होगा। व्यक्ति, वस्तु, स्थान को छोड़कर अपने में स्थित हो जाना, अपने को जान लेना, अपने को पहचान लेना ‘सोह्म’ की साधना है। सभी तीर्थंकरों, देवों, मनुष्यों में, तिर्यंच जीवों में समान आत्मा है।
युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘कर सेवा गुरु चरणन की, युक्ति यही भव तरनन की’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति के साथ अपने उद्बोधन में फरमाया कि प्रभु महावीर की वाणी जीवन कल्याण की ओर ले जाती है, उसके लिए प्रभु की वाणी को अंतःकरण से हृदयंगम करना होगा।
उन्होंने आगे फरमाया कि मुक्ति पाना आसाना नहीं है। परमात्मा ने मुक्ति पाने के लिए अनेक रास्ते बताये हैं। अनेक धर्मों में अलग-अलग रास्ते हैं, जैन धर्म में बारह तपों का वर्णन मिलता है। मूल बात है निज आत्मा के चारों ओर कर्म लगे हुए हैं। भगवान महावीर के जीवन को देखते हैं तो उन्होंने अपने जीवन को कर्म निर्जरा की ओर निरंतर अग्रसर किया। उनकी यात्रा मुक्ति की यात्रा रही है। तप की चर्चा करें तो प्रभु महावीर ने अपने नंदन मुनि के भव में 11 लाख 85 हजार 645 मासखमण किये, फिर भी उनके सर्व कर्म क्षय नहीं हो पाए, क्योंकि हो सकता है उस तप के साथ उनकी आभ्यंतर तप की साधना ना जुड़ी हो।
उन्होंने यह भी फरमाया कि हम सभी का लक्ष्य एक ही है मुक्ति की ओर जाना। साधक मुक्ति के लिए तपस्या को प्रमुख साधन मानते हैं। परमात्मा ने बारह प्रकार के तप बताये हैं, जिसमें छः बाह्य तप और छः आंतरिक तप हैं। बाह्य तप से अधिक कठिन है आभ्यंतर तप होता है। जो व्यक्ति बाह्य तप के साथ आभ्यंतर तप करता है वह निश्चित रूप से कर्म निर्जरा की ओर आगे बढ़ता है। हमारा लक्ष्य कर्म निर्जरा का है।

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