श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 21 दिवसीय अनुष्ठान का शुभारम्भ
‘विजयादशमी है मिथ्यात्व पर विजय प्राप्त करने का अवसर’ प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा.

सूरत।प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आज विजयादशमी का पर्व देशभर में मनाया जा रहा है। जो धर्म और अधर्म के प्रतिक के रूप में है। रावण के पास अपार शक्ति थी किंतु उसके पास धर्म नहीं था। भगवान राम के पास धर्म था। सत्य धर्म है, और मिथ्या अधर्म है। पाप-पुण्य दोनों कर्म है। असत्य है वहां चार गति का बंधन और संसार है।
उन्होंने फरमाया कि असत्य का प्रतिक रावण जिसके पास सोने की लंका थी, उसका ध्यान पुदगल पर था, उसने अपनी शक्ति का उपयोग पुद्गल के लिए संसार को बढ़ाने के लिए किया, जबकि भगवान राम के पास धर्म था, साधना थी, वे सत्य पर अटल रहे। जैन दर्शन के अनुसार भगवान राम आत्मा की साधना में रत रहे। इसलिए उन्हें पूजनीय बताया गया है, जबकि असत्य के प्रतीक रावण का दहन किया जाता है।
उन्होंने यह भी फरमाया देशभर में अनेक जगहों पर रामायण का मंचन किया जाता है जबकि महाभारत का नहीं किया जाता, क्योंकि रामायण त्याग, शांति, भ्रातृप्रेम और साधना का प्रतीक है जिसका हर घर में वाचन किया जाता है। राम-राज्य की बात आती है तो वहां सत्य अपने आप उद्घाटित होता है। जहां अधर्म है वहां झूठ, छल-कपट, हिंसा की बात होती है। विजयादशमी पर मिथ्यात्व पर विजय प्राप्त करने की ओर अग्रसर होंगे तो और अधिक विजयादशमी की सार्थकता होगी।
युवामनीषी श्री शुभममुनि जी के मुखारविंद से भगवान महावीर की अंतिम देशना श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 21 दिवसीय अनुष्ठान का शुभारम्भ हुआ जिसमें उन्होंने ‘‘वीर प्रभु की अंतिम वाणी उत्तराध्ययन को खोलो जय जिनवाणी बोलो’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति के साथ प्रथम अध्याय की 48 गाथाओं का मूल वांचन किया। विवेचन के अंतर्गत उन्होंने धर्म का स्वरूप समझाते हुए विधि पूर्वक स्वाध्याय की महत्ता बतलाई। उन्होंने कहा कि स्वाध्याय से कर्मों की निर्जरा का लाभ प्राप्त होता है।
चण्डीगढ़ से आए महन्त गोविन्दाचार्य जी महाराज ने प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. को यथार्थ गीता की पुस्तक भेंट की। ज्ञातव्य है आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के 84वें प्रकाशोत्सव के उपलक्ष्य में पांच राज्यों में धार्मिक पुस्तकें गीता आदि वितरित की गई।
इस अवसर पर रायपुर (छत्तीसगढ़), भीलवाड़ा, गोड़ादरा, चलथान से भी गुरु दर्शन हेतु श्रद्धालु उपस्थित हुए।
इस अवसर पर श्रावक-श्राविकाओं ने अपनी धारणा के अनुसार परोक्ष एवं प्रत्यक्ष रूप से उपवास, एकासन, आयंबिल का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।


