जो सहन करता है वह साधु होता है-शिरीष मुनि

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आज शुक्ल ध्यान का प्रयोग करवाते हुए जड़-जीव के भेद की विधि बताई तथा मोक्ष प्राप्ति में भेद विज्ञान को प्रमुख साधन बताया। सभा में प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में साधु के गुणों की चर्चा करते फरमाया कि जो क्रोध, भय उत्पन्न करने वाले उपसर्गों को शांति से सहन करता है, उपसर्ग आने पर सुख-दुःख में सम रहता है, वह भिक्षु होता है। जो साधु बनता है वह पहले आत्मार्थी बनता है। आत्मा में ठहरने की विधि सिखता हैं। अनुकूलता-प्रतिकूलता को सहन करता है।
प्रमुख मंत्री श्री जी ने आगे फरमाया कि जब कोई साधु बन जाता है तो निष्काम की भावना रहनी चाहिए। साधु को मनोरंजन से भी दूर रहना है। मनोरंजन से मोहनीय कर्म का बंध होता है, जो काली अमावस्या के बराबर है, जो घोर अंधकार की ओर ले जाने वाला होता है। साधु भीतर से संयम परिपक्व करता है, परिषहों को जीतकर मिथ्यात्व को दूर करता है। सबसे बड़ा मिथ्यात्व और मोह शरीर से होता है। जब मोहनीय कर्म टूटता है तब भीतर से सुख प्रकट होता है। उपसर्ग अथवा कोई प्रतिकूल घटना हो जाए तो आत्मार्थी दुःखी नहीं होकर वह यह चिंतन करता है कि कोई मेरे द्वारा किये हुए कर्म उदय में आये हैं जिस कारण ये उपसर्ग आये हैं और उन्हें समभाव से सहन करता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जिसे चारित्र धर्म मिला है वह उत्कृष्टता से चारित्र का पालन कर मोह तोड़ने का पुरुषार्थ करे। चारित्र धर्म में आत्मा को आत्मा में स्थित करना है। साधु जीवन में 22 परिषह बताये हैं उसमें दो ही अनुकूल है बाकी 20 प्रतिकूल है। भगवान को इसलिए वीतराग कहा गया है, क्योंकि वे बंधन मुक्त थे, बंधन दुःखी करता है। वीरों के वीर महापुरुष ही शरीर द्वारा परिषहों को जीत सकते हैं।युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘हे गुरुज्ञानी धर्म दिवाकर, करुणा सागर गुण रत्नाकर’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।इस अवसर पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से भी श्रावक-श्राविकाओं को उपवास, एकासन, आयंबिल तप का प्रत्याख्यान करवाया।




