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संवत्सरी महापर्व सम्पन्नता के बाद श्रद्धालुओं का गुरु दर्शन हेतु आगमन

सूरत।संवत्सरी महापर्व सम्पन्नता के बाद सूरत सहित आस-पास एवं दूरदराज़ के क्षेत्रों से श्रद्धालुगण आचार्य भगवन के दर्शन एवं क्षमा याचना हेतु निरंतर पहुंच रहे हैं। शनिवार को शांति भवन, घोड़दौड़ रोड सूरत से महिला मंडल की 60 सदस्याएं, संगमनेर, छत्रपति संभाजी नगर (महाराष्ट्र) और बैंगलोर से आए अनेक श्रद्धालु संघ रूप में उपस्थित हुए।

आचार्य भगवन ने अपने प्रवचन में आत्मा और शरीर की भिन्नता का ज्ञान कराते हुए गजसुकुमाल का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि जब गजसुकुमाल मुनि बने और गहन साधना में आत्मा-शरीर का भेद करते हुए ध्यानस्थ हुए, तब सोमिल ब्राह्मण ने उनके मुण्डित सिर पर धधकते अंगारे डाले। किंतु वे स्थिर रहे और मोक्ष को प्राप्त हुए। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को भी जीवन में आत्मा और शरीर को अलग-अलग देखना चाहिए। शरीर स्त्री, पुरुष या पशु का हो सकता है, किंतु उसमें स्थित आत्म तत्व सभी में समान होता है। मन, बुद्धि और इन्द्रियां जीव को भटकाती हैं, इसलिए जीव को अपने में स्थित रहकर कल्याण पथ पर अग्रसर होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संवत्सरी महापर्व पर की गई आलोचना और पर्युषण काल के शुक्ल ध्यान का बार-बार श्रवण करने से अनंत कर्मों की निर्जरा होती है। जब तक शरीर स्वस्थ है, तब तक धर्म और ध्यान में लगना चाहिए, क्योंकि धर्म ही मोक्ष मार्ग का साधन है। आचार्य भगवन ने जैन धर्म के तीन मुख्य सिद्धांतों भेदज्ञान, कर्म सिद्धांत और अनेकांतवाद का विश्लेषण किया और समझाया कि ये प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में उपयोगी हैं।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने विनय समाधि के अंतर्गत विनीत-अविनीत शिष्य का दृष्टांत प्रस्तुत किया। प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘दुनिया में आने वाले क्या तेरे मन में समाई’’ सुमधुर भजन प्रस्तुत कर क्षमा भावों पर विचार व्यक्त किए। वहीं नवदीक्षित शूचित मुनि जी महाराज ने 10 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।

संगमनेर से मुमुक्षु हर्षा शैलेष पारख अपने माता-पिता एवं संगमनेर श्रीसंघ के साथ गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुईं। तपस्वी प्रियल अनीलकुमार जैन ने 8 उपवास किए। नाशिक से श्रीमती रेणु जैन ने ऑनलाइन माध्यम से 8 उपवास तथा गुंडलपेठ (मैसूर) से संगीता गन्ना ने 5 उपवास का पच्चखान लिया।इस अवसर पर शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से मुमुक्षु हर्षा जैन एवं तपस्वी प्रियल जैन का स्मृति चिन्ह, शॉल और माला द्वारा सम्मान किया गया।

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