मिथ्यात्व से सम्यक्त्व में आना ही ध्यान है आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा.

बलेश्वर, सूरत। आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि व्यक्ति जीवनभर धन इकट्ठा करने में लगा रहता है, लेकिन वह यह सोचे कि उस धन का उसके जीवन में कितना उपयोग वह कर पाता है, शेष धन ऐसे ही पड़ा रह जाता है। इसी तरह हीरे-जवाहरात, सोने, चांदी को संभालकर रखता है, किंतु अपने शरीर के भीतर आत्मा है उसे कितना संभालते हैं वह ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। जो धन कमाया वह काम आने वाला नहीं है। जब व्यक्ति वृद्ध हो जाता है उस अवस्था में भोजन भी नहीं पचता हैं। भगवान महावीर कहते हैं सब आत्मा को समान जानो। जिसने एक आत्मा को जान लिया उसने सब जान लिया। आत्मा को देखा नहीं जा सकता उसका अनुभव किया जा सकता है।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि मनुष्य जिसका अधिक ध्यान करता है वही उसे अगले भव में प्राप्त होता है, संसार का ध्यान किया तो पुनः संसार में जन्म मिलेगा, इसलिए अपनी आत्मा का ध्यान करें कि मैं आत्मा मेरे अलावा कुछ नहीं इसके लिए संकल्प मजबूत होना चाहिए। संकल्प के लिए सबसे पहले आत्मा के प्रति अटल श्रद्धा हो, ध्यान के लिए प्रयास हो, पुरुषार्थ हो, मैं आत्मा इसकी सदैव स्मृति रहे, एकाग्रता के साथ ध्यान करें, आत्मा और शरीर का विवेक हो इनके द्वारा ही संकल्प पुष्ट होगा।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि संसारी व्यक्ति अनंत जीवन लगा देता है तो भी उसका संसार समाप्त नहीं होता, संसार का कार्य कभी समाप्त होने वाला नहीं है। संसार में रहते हुए अनेक आत्माएं सिद्ध हो गई। व्यक्ति स्वयं का अवलोकन करे कि वह चौबीस घंटे में कितना समय स्वयं को देता है और कितना समय संसार को, पर को देता है। यदि मोक्ष जाना है तो उसके लिए स्वयं को पुरुषार्थ करना होगा। स्वभाव में रहें यही सामायिक है धर्म है इसकी आराधना करें तो निश्चित ही मोक्ष प्राप्ति संभव है। संसारी देह का चिंतन करते हैं, जबकि आत्मार्थी साधक जड़-जीव के भेद को समझते हैं और बार-बार शोध करते हैं, मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, जीवन का लक्ष्य क्या है और वर्तमान में ही अनंत सुख का अनुभव करते हैं।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘उठ भोर भई, टुक जाग सही, भज वीर प्रभु, भज वीर प्रभु’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुत किया।
आज गोरेगांव मेवाड़ भवन मुंबई, वापी, इचलकरंजी, नवसारी, आशानगर (सूरत), खेड़ब्रह्मा, आदि जगहों से श्रीसंघ आचार्य भगवन के दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
ऑनलाईन के माध्यम से आदीश्वर धाम कुप्पकलां से साधिका श्रीमती मंजू जैन ने 106 एकासन का प्रत्याख्यान लिया। प्रत्यक्ष रूप से श्रीमती श्वेता मेहता ने 25 एकासन का प्रत्याख्यान लिया।



