
5 सितम्बर 2025, अवध संगरीला, बलेश्वर, सूरत।
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति को जब तक बोध प्राप्त नहीं होता तब तक वह भटकता रहता है। धर्म क्या है? पाप क्या है? पुण्य क्या है? छोड़ने योग्य क्या है? और ग्रहण करने योग्य क्या है? सार क्या है और निस्सार क्या है? इसका बोध होना जरूरी है। इसका बोध आत्मज्ञानी गुरु से ही प्राप्त हो सकता है, जब इसका बोध हो जाता है तो वह आत्मार्थी साधक बन जाता है।

उन्होंने आगे फरमाया कि जब किसी का द्वार खटखटाते हैं तो द्वार खुल जाता है, किसी वस्तु को ढूंढते हैं तो वह मिल जाती है, जिसकी चाह रखते हैं तो उसकी प्राप्ति हो जाती है। इसी तरह एक आत्मार्थी व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति के लिए अपनी आत्मा को जान लेता है, उसमें डूब जाता है तो निश्चित ही उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। एक अटल विश्वास हो कि मैं जीवात्मा हूं, मैं निज आत्मा, मेरे पास आठ गुणों की सम्पदा है। उन गुणों का बार-बार स्मरण करने से उसमें परिपक्वता आती है।
आचार्य भगवन ने यह भी फरमाया कि जब कोई व्यक्ति एक स्थान से दूसरे स्थान पर वाहन द्वारा जाता है, रास्ते में वाहन से चलते हुए सूक्ष्म छोटे जीवों की हिंसा होती है तो उसके लिए क्षमा का भाव रखते हुए अंतःकरण से प्रायश्चित प्रतिक्रमण करना चाहिए। एक गृहणी को भी गृहकार्य करते हुए जहां-जहां छहकाय जीवों की विराधना हो रही है उसकी आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रायश्चित करना आवश्यक है। भूल को भूल समझा जाए तो वह भूल दुबारा नहीं होती है। भूल को स्वीकार करने से व्यक्ति कर्म बंधन से हल्का होता है। आत्मार्थी भूल को स्वीकार कर कर्म निर्जरा के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति यह विचार करे कि मुझे चंचल नहीं अचल बनना है, चंचलता के कारण मन भटकता है। अचल शांत है जो जीव स्थिरता का अभ्यास करते हुए अचल बनने का पुरुषार्थ करता है, वह चार गति की यात्रा को सम्पन्न करने की ओर बढ़ता है।
जैन दर्शन कहता है कि कर्म के आने के रास्ते बंद कर दिये जायें तो पूर्व कर्म क्षय कर व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त होता है।
युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘शरण में आए हैं हम तुम्हारी, दया करो हे दयालु भगवन’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
उधना से आचार्य भगवन के सान्निध्य में सिद्धितप के अंतर्गत श्रीमती सरिता जयंतीलाल जी कुकड़ा ने आज छह उपवास की तपस्या का प्रत्याख्यान लिया, शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से स्मृति चिन्ह, शॉल, माला द्वारा सम्मान किया गया।




