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सत्य ही आत्मा है : आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा.

सूरत। पर्युषण पर्व के तीसरे दिन अवध संगरीला के बैंकेट हॉल में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने फरमाया कि सत्य आत्मा है। अरिहंत प्रभु की वाणी में किसी भी पुद्गल का चिंतन छोड़ना ही सबसे बड़ा त्याग है। रिश्ते-नाते, परिवार, धन-वैभव सब पुद्गल की श्रेणी में आते हैं और इसका चिंतन त्यागना ही आत्मकल्याण का मार्ग है;

 

उन्होंने कहा कि पंचम काल में प्रभु की वाणी सुनना सौभाग्य है। प्रभु वही है जो आत्मार्थी होकर भीतर आत्मा में लीन हो जाए और संसार सागर पार कर ले। आचार्य भगवंत ने बताया कि मुनि छह काया जीवों की हिंसा से बचता है, जिसमें वायु काय के जीव भी सम्मिलित हैं।

उन्होंने श्रावकों को दान व त्याग की प्रेरणा देते हुए कहा कि पर्युषण पर जीव दया जैसे कार्यों के लिए संचय धन से प्रसन्नता के साथ दान अवश्य करना चाहिए;

इस अवसर पर युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी ने सूत्र विवेचन में महाराणी देवकी का प्रसंग सुनाया। प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने अंतकृतदशांग सूत्र का वाचन किया। आत्म भवन में साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान द्वारा बताया कि जहां पुद्गल का चिंतन समाप्त होता है वहीं से वीतराग यात्रा शुरू होती है।

कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जैनाचार्यजी यूट्यूब चैनल पर किया गया। आज की प्रभावना श्री तुलसीभाई चपलोत एवं श्री शौकिन पोरखना परिवार की ओर से रही।

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