आत्म-जागृति, सरलता और वर्तमान में स्थित जीवन- आचार्य डॉ. शिवमुनि

सूरत, आत्म भवन बलेश्वर:
आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने आज के प्रवचन में “आगार और अणगार” की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि जो गृहस्थ में रहते हैं वे आगार कहलाते हैं, जबकि साधु अणगार होते हैं, जिनका कोई निश्चित घर नहीं होता। उन्होंने कहा कि अणगार मुनियों का समस्त संसार ही उनका घर होता है।
उन्होंने मुनियों की सहजता और ऋजुता को रेखांकित करते हुए कहा कि एक साधु का लक्ष्य कर्म बंधन से मुक्ति है। जैसे बच्चे में राग-द्वेष नहीं होता, वैसे ही साधु भी सरल व निष्कलंक होते हैं। जो व्यक्ति बच्चे के समान सरल होता है, वही आत्मा की शुद्धि के मार्ग पर अग्रसर होता है।
उन्होंने कहा कि सच्चा साधु वही है जो भूत और भविष्य के मोह से मुक्त होकर वर्तमान क्षण में आत्मा से जुड़ा रहता है। योगनिद्रा के उदाहरण द्वारा उन्होंने स्पष्ट किया कि शरीर विश्राम करता है पर आत्मा जागरूक रहती है। साधु वही है जिसे अपने अस्तित्व और अवसर की पहचान होती है।
रात्रि भोजन के त्याग को जीवनशैली में शामिल करने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि इससे जीव हिंसा टलती है, स्वास्थ्य लाभ होता है और समय की भी बचत होती है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति रात्रि भोजन का त्याग करता है, वह सच्चे अर्थों में जैन धर्म का पालन करता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीषजी म.सा. ने अपने प्रवचन में साधुओं को उत्साहपूर्वक श्रमण धर्म में संलग्न रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि वाणी का संयम अत्यंत आवश्यक है। किसी की अनुपस्थिति में निंदा करना आत्मा को मलिन करता है। झूठ, छल और कपट से दूर रहकर ही आत्मा का उत्थान संभव है।
युवा मुनि श्री शुभम मुनिजी म.सा. ने “खुद से खुद को जोड़ूं” शीर्षक से मधुर भजन प्रस्तुत किया, जिसने उपस्थित जनसमुदाय को आत्मिक भाव से जोड़ा।
विशेष श्रमण संघीय द्वितीय पट्टधर आचार्य सम्राट आनन्दऋषि जी म.सा. की 126वीं जन्म जयंती 25 जुलाई 2025 को देशभर में सामूहिक तेला तप आराधना द्वारा मनाई जाएगी।
ऑनलाइन माध्यम से मुंबई के हितेश मेहता ने 14 उपवास का प्रत्याख्यान लिया। पुणे से दीपक गुंदेचा, शीला गुंदेचा, अभय गुंदेचा सहित परिवार ने 6 उपवास का प्रत्याख्यान लिया। अन्य कई श्रद्धालुओं ने भी अपनी धारणा अनुसार विविध त्याग का संकल्प किया।




