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अच्छे कार्यों के प्रति हो समर्पण का भाव : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

-अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के त्रिदिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन का हुआ शुभारम्भ

साध्वीवर्याजी ने जनता को किया उद्बोधित

-श्राविका गौरव अलंकरण व प्रतिभा पुरस्कार का हुआ आयोजन

-आचार्यश्री व साध्वीप्रमुखाजी ने अलंकरण व पुरस्कार के संदर्भ में दी मंगल प्रेरणा

18.09.2025, गुरुवार, कोबा, गांधीनगर।प्रेक्षा विश्व भारती में वर्ष 2025 का चतुर्मास कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, युगप्रधान, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में अभी तेरापंथ समाज की अनेकानेक संस्थाओं के अधिवेशन, सम्मेलन आदि का दौर जारी है। गुरुवार से आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के 50वें त्रिदिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन ‘ऊर्ध्वारोहण’ का शुभारम्भ हुआ। इस अधिवेशन में भाग लेने के लिए देश भर से सैंकड़ों की संख्या में तेरापंथी महिलाओं विशेष उपस्थिति से वीर भिक्षु समवसरण मानों केसरिया रंग धारण कर लिया। श्रद्धालुओं के साथ राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल महिलाओं की उपस्थिति से प्रवचन पण्डाल भी जनाकीर्ण-सा बना हुआ था।

शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित विशाल जनमेदिनी को ‘आयारो’ आगम के माध्यम से पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि मानव जीवन में ऐसा हो कि अध्यात्म दर्शन अथवा वीतराग दर्शन पर ही दृष्टि लग जाए। आवश्यक है कि आदमी की दृष्टि कैसी है? आदमी का आकर्षण किस ओर है? आदमी की दृष्टि आत्मा की ओर है या पदार्थों की ओर? आध्यात्मिकता की तरफ रुझान है या भौतिकता की ओर आदमी जा रहा है। सम्यक् दृष्टि को प्राप्त कर लेना बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। सम्यक्त्व रत्न से बड़ा दूसरा कोई रत्न नहीं, सम्यक्त्व रूपी मित्र से बड़ा कोई मित्र नहीं और सम्यक्त्व रूपी भाई से बड़ा दूसरा कोई भाई नहीं है और सम्यक्त्व से बड़ा कोई लाभ नहीं है। जिस जीव को सम्यक्त्व की प्राप्ति हो गई, उस जीव की मुक्ति तो तय ही हो जाती है। सम्यक्त्व और चारित्र में सम्यक्त्व का ज्यादा महत्त्व है। सम्यक्त्व स्वतंत्र रह सकता है, जबकि चारित्र को सम्यक्त्व की आवश्यकता होती है। चारित्र के बिना भी सम्यक् दर्शन रह सकता है। इसलिए सम्यक्त्व का ज्यादा महत्त्व है। आदमी को संसार में रहते हुए अनेक कार्य भी करने हो सकते हैं, किन्तु आदमी की दृष्टि सम्यक् है तो फिर उसका जीवन बहुत हो सकता है। आदमी को मोक्ष की प्राप्ति की भावना होनी चाहिए।

आचार्यश्री ने मंगल प्रवचन के दौरान ही विशेष प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि पौष कृष्णा पंचमी (9 दिसम्बर 2025) को परम पूज्य कालूगणी में बालक तुलसी को मुनि दीक्षा प्रदान की थी। विक्रम संवत् 2082 चल रहा है तो आगामी पौष कृष्णा पंचमी को गुरुदेव तुलसी को दीक्षा लिए हुए सौ वर्ष पूर्ण होने वाले हैं। उस दिन साधु-साध्वियां, समणियां और भी श्रावक-श्राविकाएं ‘मुमुक्षा का महत्त्व’ विषय पर प्रकाश डालने का प्रयास करें। इसके साथ मुमुक्षु बनने की प्रेरणा भी दी जा सकती है। गुरुदेव तुलसी को दीक्षा लिए हुए सौ वर्ष पूरे होने वाले हैं। उस दिन हम सभी इस प्रसंग में प्रस्तुति दी जा सकती है। गुरुदेव तुलसी की जन्मभूमि भी लाडनूं और दीक्षा भूमि भी लाडनूं ही है। आदमी के भीतर अध्यात्म, आत्मा और मोक्ष की ओर दृष्टि हो जाए।

संयम रत्न की प्राप्ति तो भाग्य से ही होती है। गुरुदेव तुलसी की दीक्षा शताब्दी का समय भी सामने है। साधु, साध्वियों, समणियों व मुमुक्षु बाइयां भी मुमुक्षु बनाने का प्रयास कर सकते हैं। ऐसे रत्नों की खोज भी की जा सकती है। जिस कार्य के प्रति समर्पण का भाव हो जाए तो वह कार्य बहुत अच्छा हो सकता है। निष्ठा से काम हो तो उस कार्य मंे अच्छी सफलता भी प्राप्त हो सकती है। जो भी जिम्मेदारी प्राप्त हो, उसे पूर्ण निष्ठा के साथ पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी में अच्छे कार्यों के प्रति समर्पण का भाव रहे।

आचार्यश्री ने आज से प्रारम्भ हुए अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के अधिवेशन के संदर्भ में भी पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि यह अधिवेशन दायित्व के परिवर्तन से संदर्भित है। जिसे जो भी दायित्व मिले, उसे निष्ठा से पूर्ण करने का प्रयास करना चाहिए। अन्यथा पद पर आने का भी कोई लाभ नहीं हो सकता। आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीवर्या साध्वी सम्बुद्धयशाजी ने भी समुपस्थित जनता को उद्बोधित किया।

अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल के त्रिदिवसीय अधिवेशन के मंचीय उपक्रम के संदर्भ में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सरिता डागा ने अपनी अभिव्यक्ति दी। इस दौरान अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल द्वारा श्रीमती रजनी दूगड़ को इस वर्ष का ‘श्राविका गौरव अलंकरण’ प्रदान किया गया। उनके अभिनंदन पत्र का वाचन अभातेमम की ट्रस्टी श्रीमती आरती कठौतिया ने किया। इसके साथ ही सीतादेवी सरावगी प्रतिभा पुरस्कार के अंतर्गत श्रीमती दिवा जैन बैंगानी तथा सुश्री निधि राखेचा को प्रदान किया गया। इनके अभिनंदन पत्र का वाचन क्रमशः ट्रस्टी श्रीमती ज्योति जैन व ट्रस्टी श्रीमती कल्पना बैद ने किया। सभी पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं ने अपनी आस्थासिक्त अभिव्यक्ति दी।

साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने इस अवसर पर उपस्थित महिलाओं को मंगल प्रेरणा प्रदान की। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने इस संदर्भ में पावन आशीष प्रदान करते हुए कहा कि अभी अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल की ओर से अलंकरण व पुरस्कार प्रदान किया गया है। श्रद्धा, सेवा आदि की भावना बनी रहे। अपने जीवन में त्याग, संयम व साधना आदि से अपने जीवन को अच्छा बनाने का प्रयास होना चाहिए। प्रतिभा पुरस्कार में ज्ञानावरणीय कर्म का क्षयोपशम होता है। बुद्धि का सदुपयोग होना चाहिए। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल खूब अच्छा धार्मिक-आध्यात्मिक उन्नयन करता रहे। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मण्डल से संबंधित उपक्रम का संचालन अभातेमम की महामंत्री श्रीमती नीतू ओस्तवाल ने किया।

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