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-सदा स्वाध्याय में रत रहने का प्रयास करे मानव : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

पर्वाधिराज पर्युषण : स्वाध्याय दिवस के रूप में समायोजित हुआ दूसरा दिवस

-शांतिदूत आचार्यश्री ने प्रारम्भ किया ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ का वर्णन

-साध्वीप्रमुखाजी, मुख्यमुनिश्री व साध्वीवर्याजी के गीत व वक्तव्य से लाभान्वित हुए श्रद्धालु

21.08.2025, गुरुवार, कोबा, गांधीनगर।पर्वाधिराज पर्युषण का आगाज हो चुका है। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में देश-विदेश के हजारों श्रावक इस महापर्व का आध्यात्मिक लाभ उठाने के लिए पहुंचे हुए हैं। चारों ओर सूर्योदय के पूर्व से ही जो आध्यात्मिक साधना का क्रम प्रारम्भ हो रहा है, वह देर रात तक गतिमान है। श्रद्धालु इसमें स्वयं को सहभागी बनाकर अपने जीवन में आध्यात्मिक कमाई का अर्जन कर रहे हैं।

गुरुवार को पर्युषण महापर्व का दूसरा दिन स्वाध्याय दिवस के रूप में समायोजित हुआ। ‘वीर भिक्षु समवसरण’ में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगलपाठ से मुख्य कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। साध्वीवर्या साध्वी सम्बुद्धयशाजी क्षमा, क्षांति-मुक्ति धर्म पर आधारित गीत का संगान किया। मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने क्षमा, क्षांति-मुक्ति धर्म की व्याख्या की। साध्वी मैत्रीयशाजी व साध्वी ख्यातयशाजी ने स्वाध्याय दिवस के संदर्भ में गीत का संगान किया। साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने स्वाध्याय दिवस पर समुपस्थित जनता को प्रेरणा प्रदान की।

शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने श्रद्धालुओं को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि जैन दर्शन मंे आत्मवाद एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है, जहां आत्मा को शाश्वत माना गया है। आत्मा त्रैकालिक भी है और शाश्वत भी है। हर प्राणी की आत्मा व सिद्ध भगवंतों की आत्माएं हमेशा दुनिया में थीं, हैं और बनी रहेंगी। आत्मा का कभी विनाश नहीं होता। यह आत्मवाद का सिद्धांत है और इससे जुड़ा दूसरा सिद्धांत है- कर्मवाद। सिद्धों के सिवाय जो भी आत्माएं हैं, वे कर्मों से युक्त होती हैं। सिद्धों की आत्मा पूर्णतया कर्ममुक्त और विशुद्ध होती हैं। संसारी आत्माएं और यहां 14वें गुणस्थान में स्थापित जीव भी कर्मों से युक्त अर्थात् सकर्मा होती हैं। लोकवाद के संदर्भ में जैन धर्म का अपना सिद्धांत है।

आत्मावाद, कर्मवाद, लोकवाद है तो फिर पुनर्जन्मवाद भी होता है। पर्युषण के दौरान चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा का वर्णन भी किया जाता है। भगवान महावीर की आत्मा ने भी अनंत-अनंत जन्म-मरण किए थे। अनंत जन्मों का वर्णन करना, वश की बात नहीं। उनमें से कुछ जन्मों का विवरण उपलब्ध होता है। उनमें 27 जन्मों का वरण किया जाता है।

वर्तमान में हम सभी जिस द्वीप में रह रहे हैं, वह जम्बूद्वीप है, उसके भरतक क्षेत्र में हम सभी वर्तमान में रह रहे हैं। आचार्यश्री ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के वर्णन प्रसंग का शुभारम्भ करते हुए कहा कि जयंती नामक नगरी में राजा शत्रुमर्दन था। उस राज्य में एक गांव पृथ्वीप्रतिष्ठान था। उस गांव का एक प्रमुख व्यक्ति नयसार था। एक बार नयसार को साधुओं का सान्निध्य मिला और उसे प्रेरणा मिली तो इसी जन्म में नयसार को सम्यक्त्व की प्राप्ति हो गई। आयुष्य पूर्ण कर नयसार की आत्मा प्रथम देवलोक में उपपन्न होता है।

आचार्यश्री ने स्वाध्याय दिवस के संदर्भ में समुपस्थित जनता को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि पर्युषण महापर्व के अंतर्गत आज दूसरा दिन स्वाध्याय दिवस के रूप में स्थापित है। स्वाध्याय एक प्रकार की खुराक बन सकता है। साधु-साध्वियों व समणियों आदि के लिए स्वाध्याय भी एक खुराक है। जितना संभव हो सके, नियमित रूप से स्वाध्याय करते रहने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान में तो इतने आगम भी उपलब्ध हो गए हैं। आदमी को कुछ न कुछ प्रतिदिन पढ़ते रहना चाहिए। पढ़ने से आदमी का समय शुभयोग में रह सकता है। कंठस्थ ज्ञान का पुनरावर्तन भी करते रहना चाहिए। गीतों को स्वाध्याय के रूप में काम ले सकते हैं। मानव जीवन मिला है तो स्वाध्याय करते रहने का प्रयास होना चाहिए।

 

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