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काम और अर्थ पर रहे धर्म का अंकुश : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

-‘भिक्षु चेतना वर्ष’ के महाचरण में आचार्यश्री ने महामना के गृहस्थ जीवन को किया वर्णित

-साध्वीवर्याजी ने निर्धारित विषय पर जनता को किया उद्बोधित

-मुनि वर्धमानकुमारजी ने गीत को दी प्रस्तुति-बालोतरा से समागत साध्वी अणिमाश्रीजी ने व्यक्त किए अपने हृदयोद्गार

17.12.2025, बुधवार, कंटालिया, पाली (राजस्थान) :जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, महामना आचार्यश्री भिक्षु की जन्मस्थली कंटालिया में ‘आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष’ के महाचरण का समायोजन तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में भव्य रूप में समायोजित हो रहा है। इस महाचरण में भाग लेने के लिए केवल कंटालिया व आसपास के श्रद्धालु ही नहीं, अपितु देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालुओं के पहुंचने का क्रम जारी है।

बुधवार को महामना के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के महाचरण का तृतीय दिवस था। रावले में बने विशाल प्रवचन पण्डाल में वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी के मंगल महामंत्रोच्चार के साथ कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। मुनि वर्धमानकुमारजी ने गीत का संगान किया। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने आज के विषय ‘आचार्य भिक्षु का गार्हस्थ्य जीवन’ विषय पर समुपस्थित जनता को उद्बोधित करते हुए उनके सांसारिक जीवन के अनेक घटना प्रसंगों का वर्णन किया।

तुदपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने महाचरण के तीसरे दिन ‘आचार्य भिक्षु के गृहस्थ जीवन के संदर्भ में विस्तृत प्रकाश डालने के साथ ही पावन उद्बोधन प्रदान करते हुए कहा कि धर्म को बहुत महत्ता प्राप्त है। इसे उत्कृष्ट मंगल का गौरव भी प्राप्त है। जिस आदमी के जीवन में धर्म होता है, उसका जीवन गौरवमय बन जाता है। मनुष्य जन्म लेता है, जीवन जीता है और एक दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। जन्म लेना और मृत्यु को प्राप्त होना सामान्य-सी बात है। यह संसार के प्रत्येक व्यक्ति के साथ घटित होता है, परन्तु जन्म-मृत्यु के बीच का जो जीवन का समय होता है, वह सबका अपना-अपना होता है और विशिष्ट भी हो सकता है।

हम अभी वर्तमान में महामना आचार्यश्री भिक्षु के जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के संदर्भ में उनकी जन्मस्थली कंटालिया में महाचरण मना रहे हैं। इसे महाचरण कहने के पीछे दो आधार हो सकते हैं-पहली बात है कि जिस महापुरुष की जन्म त्रिशताब्दी मना रहे हैं, उनकी जन्मस्थली में मनाया जाने वाला यह चरण इस संदर्भ में इसे महाचरण कहा जा सकता है। प्रेक्षा विश्व भारती में उनका जन्मदिवस भले आ गया था, लेकिन वह उनका जन्म क्षेत्र नहीं था। जन्मभूमि में मनाए जाने के कारण इसे महाचरण कहा जा सकता है। क्षेत्र और काल में अंतर होता है। काल तो कहीं भी आ सकता है। लाडनूं हों अथवा अन्य कहीं भी हों, वहां भी आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी आ जाएगी, लेकिन कंटालिया तो जहां है, वहां आना पड़ेगा। इसलिए काल को पाना सुलभ और क्षेत्र को प्राप्त करना दुर्लभ होता है। जन्मभूमि में यह चरण मनाए जाने के कारण यह महाचरण है।

दिनों की संख्या की दृष्टि से भी यह तेरह दिवसीय आयोजन है। इसलिए भी यह महाचरण है। इसमें जो गीत और वक्तव्य आदि होते हैं। इसमें गीत गाने वाला बढ़िया और वक्तव्य भी पूरी तैयारी के साथ हो तो बहुत अच्छा हो सकता है। वक्तव्य अथवा प्रवचन कितना प्रभावशाली हो सकता है, इसका प्रयास किया जा सकता है। कुछ बोलने से वक्ता को अच्छी तैयारी कर लेने का प्रयास करना चाहिए। वक्तव्य में प्रमाणिकता भी रहे तो वक्तव्य प्रभावशाली हो सकता है। वक्तव्य अच्छा होता है तो श्रोता भी मानों उससे बंध सकते हैं।

आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आचार्यश्री भिक्षु के गृहस्थ जीवन का वर्णन करते हुए कहा कि उनका गृहस्थ का जीवन बहुत ज्यादा लम्बा नहीं था। आचार्यश्री भिक्षु के गृहस्थ जीवन में भी कितनी धार्मिकता थी। उनकी साधना का संकल्प जागृत हुआ और सजोड़े दीक्षा की भावना जागृत हो गई। सजोड़े दीक्षा लेने का संकल्प भी बड़ी और विशेष बात है। उसके साथ उन्होंने एकान्तर तप भी प्रारम्भ कर दिया। भगवान महावीर के साथ आचार्यश्री भिक्षु की अनेक समानताएं प्राप्त होती हैं। भगवान महावीर का भी कुछ समय गृहस्थ जीवन में बीता था। आज भी कितने लोग गृहस्थ जीवन जीते हैं। गृहस्थ जीवन में भी पुरुषार्थ होना चाहिए। गृहस्थ जीवन में अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष में संतुलन रखने का प्रयास करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में काम और अर्थ पर धर्म का अंकुश हो तो गृहस्थ जीवन भी अच्छा हो सकता है। यह जन्म शताब्दी हमारे जीवनकाल में आई है। आचार्यश्री ने आचार्यश्री भिक्षु के संदर्भ में संस्कृत भाषा में प्रार्थना का संगान किया

आचार्यश्री ने बालोतरा से समागत साध्वियों को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वी अणिमाश्रीजी ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए अपने सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया।

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