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झूठा आरोप लगाना है पाप, इससे बचने का प्रयास करे मानव : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण

मेवाड़ से मारवाड़ में पधारे मानवता के मसीहा महाश्रमण,-दिवेर घाटी को पारकर पाली जिले में शांतिदूत ने किया पावन प्रवेश

-16 किमी विहार कर पधारे कोट सोलंकियान

06.12.2025, शनिवार, कोट सोलंकियान, पाली (राजस्थान) :राजस्थान के मेवाड़ की धरा को अपनी चरणरज से पावन बनाने वाले, वीरों की भूमि पर आध्यात्मिकता की ज्ञानगंगा प्रवाहित करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को दिवेर से मंगल प्रस्थान किया। दिवेर वह भूमि जहां कभी महारणा प्रताप के वंशज अमर सिंह की सेना ने मुगलों पर विजय प्राप्त की थी। अपनी जन्मभूमि की रक्षा के लिए साहसिक परिचय देने वाली इस भूमि का मानों कण-कण वीरता की गौरवगाथा गाता है। दिवेर में एक पहाड़ी के शिखर पर दिवेर विजय स्थली भी बनी है। जो कोसों दूर से भी दिखाई देती है। वर्तमान में यह विजय स्थली उस शौर्य का यशोगान कर रही है।

शनिवार को प्रातःकाल महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने दिवेर से मंगल प्रस्थान किया। आज आचार्यश्री का मेवाड़ की धरा पर इस यात्रा का अंतिम विहार हो रहा था। पहाड़ी मार्ग में आज केवल अवरोह ही अवरोह दिखाई दे रहा था मानों अध्यात्म जगत के शिखरपुरुष अरावली की ऊंची चोटियों से पुनः नीचे की ओर लौट रहे थे। मार्ग में दूर-दूर पहाड़ों आदि के मध्य फैले जंगल प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे। अनेक स्थानों पर बन्दरों और लंगूरों की विशेष प्रजातियां भी दिखाई दे रही थीं। विहार के दौरान महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने राजसमंद जिले की सीमा को अतिक्रान्त कर पाली जिले की सीमा में मंगल प्रवेश किया। इस अवसर पर पाली से संबंधित श्रद्धालुओं ने युगप्रधान आचार्यश्री का भावभीना स्वागत किया। महातपस्वी आचार्यश्री आज लगभग सोलह किलोमीटर का विहार परिसम्पन्न कर पाली जिले के कोट सोलंकियान गांव में स्थित जैन धर्म के एक भवन में पधारे। मारवाड़ के श्रद्धालुओं व बड़ी संख्या में उपस्थित ग्रामीणों ने मानवता के मसीहा का भावभीना स्वागत किया। मार्ग में अनेक जगह पर स्कूलों में पढ़ने जा रहे विद्यार्थियों को भी आचार्यश्री से मंगल आशीष प्राप्त हुआ।

प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन में समुपस्थित श्रद्धालु जनता को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि किसी पर झूठा आरोप लगाना एक पाप है। बात में सच्चाई हो तो आरोप लगाना उतनी बुरी बात नहीं होती, लेकिन किसी पर अनावश्यक द्वेषवश, लोभ अथवा क्रोधवश झूठ बोलकर फसाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। झूठा आरोप लगाना अभ्याख्यान पाप हो जाता है। आदमी को उस पाप का कभी फल भी भोगना हो सकता है। आदमी अपने जीवन में कभी किसी दूसरे पर झूठा आरोप लगाने से बचने का प्रयास करना चाहिए।

जहां तक संभव हो आदमी को सत्य के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए और झूठ रूपी पाप से बचने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि पौष कृष्णा तीज को साध्वी कुन्दनरेखाजी व साध्वी आनंदप्रभाजी की दीक्षा के पचास वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं। वे साध्वियां आगम स्वाध्याय आदि पर ध्यान देने का प्रयास करना चाहिए। कंठस्थ ज्ञान का चिताड़ना भी हो सकता है। स्वाध्याय चलता रहे। संयम में भी जागरूकता रहे। आचार्यश्री ने साध्वियों को सेवा देने का प्रयास होना चाहिए। यहां के लोगों में अच्छी धार्मिक भावा बनी रहे।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुविभाजी ने उपस्थित जनता को उद्बोधित किया। कोट सलंकियान की ओर से श्री कुन्दनमल कोठारी व श्री अमृतलाल गिड़िया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। गिड़िया परिवार की महिलाओं तथा जैन संघ की महिलाओं ने पृथक्-पृथक् स्वागत गीत का संगान किया। नन्हें बालक आरव और मेहुल ने अपनी बालसुलभ प्रस्तुति दी।

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