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दुर्गति से बचाती है सरलता व सहजता : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण

- 267 वां आचार्य भिक्षु अभिनिष्क्रमण दिवस समारोह- जैन विश्व भारती स्थापना दिवस पर गुरूदेव की पावन प्रेरणा

27.03.2026, शुक्रवार, लाडनूं:जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के पावन सान्निध्य में आज जैन विश्व भारती का स्थापना दिवस मनाया गया। प्रभात वेला में आचार्य प्रवर ने सचिवालय में पधार कर मंगलपाठ प्रदान किया। अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के मुख्यालय रोहिणी में भी गुरुदेव का पदार्पण हुआ। आचार्य श्री से मंगलपाठ श्रवण कर मंडल द्वारा तीन दिवसीय युवती सम्मेलन “संगम” का शुभारंभ हुआ। सुधर्मा सभा में मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में साध्वियों द्वारा प्रज्ञा गीत के संगान से मंगलाचरण हुआ।

जन सभा को संबोधित करते हुए परमपूज्य आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि यह संसार अशाश्वत है, और प्राणी दुर्गति से तभी बच सकता है जब उसके जीवन में तपोगुण, ऋजुमति, सरलता व सहजता, क्षमा और संयम का भाव हो। आज चैत्र शुक्ला नवमी राम नवमी का पावन दिन है, जो तेरापंथ के आद्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु का अभिनिष्क्रमण दिवस भी है। मारवाड़ के कंटालिया गांव में जन्मे संत भीखण जी की माता दीपा जी ने उनके जन्म से पूर्व सिंह का स्वप्न देखा था, और वास्तव में आचार्य भिक्षु का अदम्य पराक्रम, निर्भीकता और साहस उस सिंह के स्वप्न को पूरी तरह चरितार्थ करता है। वे इस भरत क्षेत्र में एक भावितात्मा अनगार के रूप में प्रकट हुए। गुरुदेव ने भगवान श्री राम का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार राम ने केवल वानर सेना के सहयोग से लंका पर विजय प्राप्त कर ली थी, क्योंकि महान पुरुषों की सफलता बाहरी उपकरणों में नहीं, बल्कि उनके भीतरी सत्व, मनोबल और साहस में बसती है, ठीक उसी प्रकार आचार्य भिक्षु ने भी भारी विरोध, अवरोध और कठिनाइयों के बावजूद आज ही के दिन अपना अभिनिष्क्रमण किया। वे प्राणों की परवाह किए बिना जंगल के शेर की भांति अपने सिद्धांतों के पथ पर आगे बढ़ते रहे और एक महान धर्म क्रांति का सूत्रपात किया।

गुरुदेव ने आगे फरमाया कि तेरापंथ नाम के साथ भी एक बड़ा योग जुड़ा है। एक ओर इसमें 13 साधु, 13 श्रावक और 13 नियमों की संख्या का भाव है, तो दूसरी ओर इसमें चरम विनयशीलता का भी दर्शन होता है कि हे प्रभो! यह तेरा पंथ है, पंथ आपका है, हम तो केवल इस पर चलने वाले पथिक हैं। आचार्य भिक्षु द्वारा रचित एक आचार्य की आज्ञा में रहने जैसी मर्यादाएं आज भी हमारे धर्म संघ में पूरी निष्ठा से पाली जा रही हैं। इसके साथ ही आज जैन विश्व भारती (लाडनूं) का स्थापना दिवस भी है, जिसका प्रादुर्भाव आचार्य श्री तुलसी के समय में हुआ था। आचार्यश्री ने इसे समाज की ‘कामधेनु’ और ‘जय कुंजर’ बताते हुए कहा कि पूरी दुनिया में यह अपने आप में एक अद्वितीय परिसर है। यहाँ शिक्षा, जैन विद्या के आगमों का शोध, ध्यान-साधना के शिविर और सेवा, आयुर्वेद व प्राकृतिक चिकित्सा की सभी अनुकूलताएं एक ही स्थान पर उपलब्ध हैं। गुरुदेव ने मंगल कामना करते हुए कहा कि जैन विश्व भारती इसी प्रकार एक सौहार्द और मैत्री भाव के साथ लोगों के आध्यात्मिक और धार्मिक जीवन का उत्थान करती रहे।
कार्यक्रम में साध्वी श्री मनोज्ञप्रभा जी ने अपने विचार रखे।

इस अवसर पर जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचंद लुंकड़, मुख्यन्यासी श्री जयंतीलाल सुराणा ने अपने विचारों को प्रस्तुति दी। आचार्य प्रवर की प्रेरणा से जैन विश्व भारती के कार्यकारी स्टाफ ने एक वर्ष तक समस्त प्रकार के नशीले पदार्थों के सेवन का त्याग कर नशामुक्ति की ओर कदम बढ़ाएं।

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