भाग्यवाद ज्ञातव्य और पुरुषार्थवाद है कर्त्तव्य : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण
आचार्यश्री ने ‘संयम में पराक्रम’ विषय को किया व्याख्यायित प्रथम जैन विद्या विज्ञ सम्मेलन के संभागियों को मिली पावन प्रेरणा दिल्ली ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने दी गीत को प्रस्तुति

4.04.2026, शनिवार, लाडनूं :युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने शनिवार को जैन विश्व भारती परिसर में बने भव्य सुधर्मा सभा में उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ को आज के निर्धारित विषय ‘संयम में पराक्रम’ पर पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि चार चीजें दुर्लभ बताई गई हैं- मनुष्य जन्म दुर्लभ है। धर्म का श्रवण भी मुश्किल है। श्रद्धा भी परम दुर्लभ है और इसी प्रकार वीर्य भी दुर्लभ है। श्रद्धा को परम दुर्लभ कहा गया है, क्योंकि जब तक श्रद्धा नहीं होती, तब तक वीर्यपूर्वक पराक्रम संभव नहीं हो सकता। श्रद्धा हो जाती है तो वीर्य शायद उतना दुर्लभ नहीं होता है।
आदमी को संयम में पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। दो बातें हैं-भाग्यवाद और पुरुषार्थवाद। आदमी को दोनों को जानने का प्रयास करना चाहिए। श्लोककार ने बताया गया कि केवल भाग्य और केवल पुरुषार्थ पर नहीं टीकना चाहिए। अच्छा आदमी वहीं होता है, जो भाग्य और पुरुषार्थ दोनों को जानता है और दोनों पर ध्यान देता है। जीवन में आदमी को यथावसर भाग्यवाद और पुरुषार्थवाद को भी काम में लेना चाहिए। भाग्यवाद ज्ञातव्य है और पुरुषार्थवाद कर्त्तव्य का पथ है। आचार्यश्री ने चारित्रात्माओं को विशेष परामर्श देते हुए कहा कि ज्योतिष आदि में ज्यादा समय लगाने से बचने का प्रयास करना चाहिए।
जीवन है, उसमें कई परिस्थितियां आ सकती हैं। कभी कोई कठिनाई आ सकती है, मुश्किल समय आ सकता है, उसमें आदमी को ज्यादा तनाव, अशांत होने से बचने का प्रयास करना चाहिए। कभी चोट लग जाए, शारीरिक पीड़ा हो जाए तो भी आदमी को शांत भाव में रखने का प्रयास करना चाहिए और आदमी को आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में कभी असफलता आए तो उस असफलता से सबक सीखकर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए और संभव हो सकता है कि आगे सफलता भी मिल सकती है।
भाग्यवाद को जान लेने चाहिए और उसका यथावसर उपयोग कर लेना चाहिए, किन्तु पुरुषार्थवाद को छोड़ना नहीं चाहिए। भाग्यवाद की सीमा होती है तो पुरुषार्थवाद की सीमा भी होती है। पारणामिक भाव को कोई बदलने वाला नहीं हो सकता। आदमी को अपने जीवन में यथासंभव पुरुषार्थ करने का प्रयास करना चाहिए। संयम के क्षेत्र में यथासंभव पुरुषार्थ किया जा सकता है। जहां तक उसकी सीमा हो, वहां तक पुरुषार्थ किया जा सकता है। भाग्य की चिंता करना नहीं और पुरुषार्थवाद को निरंतर करते रहने का प्रयास होना चाहिए। कहा भी गया है कि जो उद्योगी, पुरुषार्थी होता है, मानों उसका लक्ष्मी स्वयं वरण करती हैं। अध्यात्म, संयम व तप में यथासंभव पराक्रम करते रहने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीवर्या संबुद्धयशाजी ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुति की तो आचार्यश्री ने उसे समाहित किया। समण संस्कृति संकाय के अंतर्गत जैन विद्या पाठ्यक्रम भाग- एक से चार भाग के नवीन पुस्तकों आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचंद लुंकड़, समण संस्कृति संकाय की ओर से श्री मालचंद बैंगानी व श्री हनुमान लुंकड़ ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। दिल्ली ज्ञानशाला की प्रशिक्षिकाओं ने गीत का संगान किया। इस संदर्भ में भी आचार्यश्री ने शुभाशीर्वाद प्रदान किया।



