Uncategorized

प्रमाद हिंसा तो अप्रमाद है अहिंसा : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

- अहिंसा महाव्रत के संदर्भ में गुरुदेव द्वारा प्रेरणा पाथेय- अनुशासन पर्व पर परिषद में हाजरी का वाचन

18.03.2026, बुधवार, लाडनूं:जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में चतुर्विध धर्मसंघ योगक्षेम वर्ष की आराधना कर रहा है। जैन विश्व भारती के सौम्य परिसर में अध्यात्म, तप और संयम की मंगल तरंगें अनवरत प्रवाहित हो रही हैं। गुरुदेव की सन्निधि में आज चैत्र कृष्णा चतुर्दशी पर अनुशासन पर्व आयोजित हुआ। पूज्यप्रवर ने तेरापंथ के आद्य प्रणेता आचार्य श्री भिक्षु द्वारा लिखित मर्यादा पत्र का वाचन कर साधु साध्वियों को मर्यादा की स्मारणा कराई।

सुधर्मा सभा में मंगल देशना देते हुए आचार्य श्री ने कहा जो प्राणातिपात अर्थात प्राणियों की हिंसा नहीं करता, वह शांत और सम्यक कहलाता है। जैन शासन में साधु के पंच महाव्रतों में पहला महाव्रत सर्व प्राणातिपात विरमण यानी अहिंसा महाव्रत है। आत्मा ही अहिंसा है और आत्मा ही हिंसा है। एक प्रकार से जो साधु अप्रमत्त जागरूक है, वह अहिंसक है और जो प्रमादी लापरवाह है, वह हिंसक है। एक अप्रमत्त साधु यदि पूर्ण विधि और ईर्या समिति से चल रहा है और आकस्मिक रूप से कोई जीव उसके पैर के नीचे आकर मर भी जाए, तो निश्चय नय के अनुसार वह अहिंसक ही है और उसे पाप कर्म का बंध नहीं होता। जीव हिंसा से बचने के लिए गुरुदेव ने अत्यंत तेज गति वाले साधनों या वाहनों के अनावश्यक उपयोग से बचने की प्रेरणा दी, क्योंकि अत्यंत तेज गति से चलने पर चींटियों या छोटे जीवों की रक्षा पर पूरा ध्यान रख पाना कठिन होता है। नंगे पांव चलने एक तपस्या और साधना साधना है, जिससे गति भी संतुलित रहती है और जीवों की अहिंसा की अधिक अच्छी तरह से पालना हो पाती है।

चैत्र कृष्णा चतुर्दशी और ‘अनुशासन पर्व’ के पावन प्रसंग पर हाजरी का वाचन करते हुए आचार्य प्रवर ने पांच महाव्रत, पांच समितियां और तीन गुप्तियां की अखंड आराधना पर बल दिया। गुरुदेव ने कहा कि दैनिक जीवन की छोटी-छोटी क्रियाओं में भी अहिंसा की पूर्ण जागरूकता रहनी चाहिए। जैसे दरवाजों को खोलते और बंद करते समय जल्दबाजी न करनी चाहिए पहले पूंजनी से प्रमार्जन करना और भली-भांति देखकर ही दरवाजा खिसकाना चाहिए ताकि कोई छिपकली या छोटे जीव-जंतु बीच में आकर न मरे। हमारी चर्या में जीवों के प्रति दया और आत्मा की रक्षा का भाव ही अहिंसा महाव्रत का मूल सार है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button