
सूरत। खाड़ी क्षेत्र में चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है, जिसका असर अब सूरत सहित देश के पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। बाजार में मिलने वाली पीने के पानी की बोतलों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक कच्चे माल की भारी कमी पैदा हो गई है, जिससे बोतल बनाने की लागत तेजी से बढ़ गई है।
उद्योग से जुड़े लोगों के अनुसार युद्ध के कारण विदेशों से आने वाला कच्चा माल काफी कम हो गया है। इससे प्लास्टिक के रॉ मटेरियल की उपलब्धता घट गई है और कीमतों में तेज उछाल आया है। ऑल गुजरात पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष ने बताया कि मौजूदा परिस्थितियों ने उद्योग की कमर तोड़ दी है। प्लास्टिक का जो कच्चा माल दिसंबर 2025 से पहले करीब 100 रुपये प्रति किलो मिलता था, उसकी कीमत अब लगभग 150 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है।
इसी तरह बोतल बनाने में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक दाने (ग्रेन्यूल्स) की कीमतों में भी भारी वृद्धि हुई है। पहले इसका दाम करीब 1 लाख 20 हजार रुपये प्रति टन था, जो अब बढ़कर लगभग 1 लाख 95 हजार रुपये प्रति टन तक पहुंच गया है। यानी करीब 75 हजार रुपये प्रति टन की वृद्धि दर्ज की गई है। उद्योगपतियों का कहना है कि मांग के मुकाबले कच्चे माल की आपूर्ति बेहद कम हो गई है।
स्थानीय डीलरों के मुताबिक महंगाई का असर केवल बोतलों पर ही नहीं, बल्कि उनके अन्य हिस्सों पर भी पड़ा है। बोतल के ढक्कन की कीमत में प्रति नग करीब 7 पैसे की बढ़ोतरी हुई है, जबकि लेबल की कीमत में 5 से 10 पैसे तक का इजाफा हुआ है। इसके अलावा पैकिंग मटेरियल भी करीब 70 रुपये प्रति किलो महंगा हो गया है।
हालांकि, बढ़ती लागत के बावजूद निर्माता फिलहाल उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने से बच रहे हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि छोटी पानी की बोतलों का एक बॉक्स अभी भी डीलरों को 95 से 100 रुपये के बीच ही दिया जा रहा है। बाजार में पानी की बोतलों के दाम बढ़ने की चर्चा फिलहाल अफवाह बताई जा रही है, लेकिन यदि कच्चे माल की कमी और कीमतों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहा तो आने वाले समय में उत्पादन बनाए रखना भी मुश्किल हो सकता है।



