
-राष्ट्रसंत की मंगल सन्निधि में पहुंचे भारत के शिक्षामंत्री व राजस्थान के शिक्षामंत्री
-आपकी सन्निधि में विद्यार्थी बनकर उपस्थित हूं : केन्द्रीय शिक्षामंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान
-राजस्थान के शिक्षामंत्री ने दी भावनाओं को अभिव्यक्ति, आचार्यश्री से मिला मंगल आशीष
-आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में आयोजित हुआ विराट हिन्दू सम्मेलन
27.01.2026, मंगलवार, छोटी खाटू, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) :छोटी खाटू की धरा पर पहली बार भव्य रूप में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ का 162वां मर्यादा महोत्सव सुसम्पन्न हो चुका है। हालांकि तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अभी छोटी खाटू में ही विराजमान हैं। पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार आचार्यश्री दस दिवसीय प्रवास कर रहे हैं।
मंगलवार को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में एक ओर भारत के शिक्षामंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान, राजस्थान के शिक्षामंत्री श्री मदन दिलावर आदि अनेक राजनैतिक गणमान्यों ने पहुंचकर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्यश्री का शिक्षामंत्री महोदय से वार्तालाप का क्रम भी रहा। दूसरी ओर राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में विराट हिन्दू सम्मेलन का भी आयोजन हुआ। जिसमें आचार्यश्री ने उपस्थित होकर जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान किया।

मंगलवार को मर्यादा समवसरण में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी के साथ भारत सरकार के शिक्षामंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान व राजस्थान के शिक्षामंत्री श्री मदन दिलावर भी उपस्थित हुए। आचार्यश्री महाश्रमण मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति के अध्यक्ष श्री मनसुखलाल सेठिया ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने समुपस्थित जनता को पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि जैन आगम उत्तराध्ययन में शिक्षा प्राप्ति में पांच प्रकार की बाधाएं बताई गई हैं, जिनके कारण व्यक्ति शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता। पहली बात बताई गई कि जिसमें विनय का भाव न हो, ज्ञान प्रदाता के प्रति सम्मान का भाव नहीं और केवल अहंकार ही भरा हो, वहां ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए विद्यार्थी को अहंकार से बचने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान की प्राप्ति हो जाए तो भी उस ज्ञान का अहंकार नहीं, बल्कि शिक्षा का सदुपयोग करने का प्रयास करना चाहिए।

दूसरी बाधा बताई गई- क्रोध। जिसे बहुत ज्यादा क्रोध आता हो, उसे भी ज्ञान ग्रहण करने में कठिनाई हो सकती है। इसलिए विद्यार्थी को ज्यादा गुस्से से बचने का प्रयास करना चाहिए और अपने स्वभाव को शांत रखने का प्रयास करना चाहिए। तीसरी बाधा है-प्रमाद। प्रमाद भी ज्ञान प्राप्ति में बाधा है। विद्यार्थी अन्य चीजों में रस लेने लग जाए, कभी खाने में, कभी मौज-मस्ती, खिलवाड़ आदि में शिक्षा के समय प्रमाद करने लगे तो भला वह कितना ज्ञान ग्रहण कर सकता है। इसलिए विद्यार्थी को प्रमाद से बचने का प्रयास करना चाहिए।
चौथी बाधा बताई गई है- रोग। अगर कोई विद्यार्थी रोगग्रस्त हो जाए तो वहां भी ज्ञान प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसलिए शरीर का रोगमुक्त और स्वस्थ होना ज्ञान प्राप्ति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। पांचवीं बाधा आलस्य को कहा गया है। विद्यार्थी के भीतर मन में आलस्य आ जाता है तो फिर ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पाती। इसलिए विद्यार्थी आलस्य से भी बचने का प्रयास करना चाहिए। विद्यार्थी उद्यम, परिश्रम करे तो शिक्षा की प्राप्ति कर सकता है।

इन पांचों विद्यार्थी बचकर रहे तो विद्यार्थी ज्ञान के क्षेत्र में सफलता को प्राप्त कर सकता है। ज्ञान से प्रकाश मिलता है। अज्ञान अधंकार के समान है। ज्ञान प्रकाशकर होता है। ज्ञान होता है तो उसका सार होता है आचार। ज्ञान के साथ-साथ आचार भी अच्छे बनें। इसके लिए अच्छे संस्कारों का विकास भी बहुत आवश्यक होता है। शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों के विकास भी प्रयास करना चाहिए। बच्चों को अहिंसा, नैतिकता, ईमानदारी, नशामुक्ति आदि के संस्कार भी दिए जाते रहें। आचार्यश्री ने समुपस्थित विद्यार्थियों को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करते हुए इनकी प्रतिज्ञाएं भी कराईं। विद्यार्थियों ने इन प्रतिज्ञाओं को सहर्ष स्वीकार किया।
आचार्यश्री ने समुपस्थित केन्द्रीय शिक्षामंत्री व राज्य शिक्षामंत्री को संबोधित करते हुए कहा कि आज केन्द्रीय शिक्षामंत्रीजी व राजस्थान राज्य के शिक्षामंत्रीजी का आगमन हुआ है। विद्यार्थियों में अच्छी शिक्षा व संस्कारों का कैसे और अधिक विकास हो सके, ऐसा कार्य होता रहे। भारत जैसे देश में जहां इतने धर्म-अध्यात्म की बात है। कितने प्राचीन ग्रंथ आदि भी उपलब्ध हैं। अच्छे ज्ञानवान विद्यार्थियों को तैयार कर देना बहुत अच्छी बात हो सकती है। राजनीति के माध्यम से जनता की कितनी सेवा की जा सकती है। विद्यार्थियों में अच्छे शिक्षा का विकास होता रहे। आचार्यश्री ने मंत्रीद्वय को मर्यादा महोत्सव के आयोजन की जानकारी भी दी।

आचार्यश्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त किसान आयोग के अध्यक्ष श्री सी.आर. चौधरी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। राजस्थान के शिक्षामंत्री श्री मदन दिलावर ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि महान आचार्यश्री महाश्रमणजी के चरणों में वंदन करता हूं। हम सभी परम सौभाग्यशाली हैं कि अहिंसा, संयम और साधना के जीवंत प्रतीक आचार्यश्री महाश्रमणजी के दर्शन का अवसर मिल रहा है। हम सभी राजस्थानवासियों को आपसे मंगल प्रेरणा प्राप्त हो रही है।
भारत सरकार के शिक्षामंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान ने अपने उद्बोधन में कहा कि परम श्रद्धेय आचार्यश्री महाश्रमणजी को सादर प्रणाम करता हूं। छोटी खाटू की इस पुण्यभूमि पर आकर स्वयं को धन्य महसूस कर रहा हूं। यहां आप जैसे संत के पदार्पण से यह धरती तीर्थस्थल बन गई है। मेरा सौभाग्य है कि आज आपके चौथी बार दर्शन का लाभ हुआ है। मैं आपकी सन्निधि में एक विद्यार्थी के रूप में ही उपस्थित हुआ हूं। आचार्यश्री के प्रवचनों का नोट बनाया हूं। आज आप द्वारा प्रेरणा सिर्फ विद्यार्थियों को ही नहीं, हम सभी को ग्रहण करने के लिए है। बुद्धि समाज हित में लगे। लाडनूं प्रवास के दौरान एक बार पुनः आपसे कुछ ग्रहण करने के लिए उपस्थित होंगे।

आज हिन्दू सम्मेलन आयोजन समिति, छोटीखाटू मण्डल द्वारा मर्यादा समवसरण में विराट हिन्दू सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें राष्ट्रसंत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने भी अपनी सन्निधि प्रदान करते हुए बड़ी संख्या में उपस्थित जनता को पावन पाथेय प्रदान किया। इस सम्मेलन में अखिल भारतीय सांगलीया पीठ धूणा के पीठाधिश्वर श्री ओमदासजी महाराज, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के राजस्थान स्तरीय क्षेत्रीय प्रचारक श्री निम्बारामजी तथा कई अनेक क्षेत्रों के संत समुदायों की उपस्थिति रही। उन्होंने ने भी सम्मेलन में उपस्थित जनता को उद्बोधित किया।



