सत्संग व भगवत स्मरण ही मानव जीवन का परम फल : स्वामी डॉ. राजेंद्र दास देवाचार्य
श्रीमद्भागवत कथा के समापन पर जीवन की नश्वरता, धर्माचरण व पारिवारिक संस्कारों पर मार्मिक प्रवचन

सूरत। आस्तिक-धार्मिक नगरी सूरत के वेसू क्षेत्र स्थित वीआईपी रोड पर श्री कामधेनु मंडपम में श्री जड़खोर गोधाम गौशाला में सेवित गोवंश के संरक्षण एवं सेवा के पावन उद्देश्य से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ का रविवार को भावपूर्ण वातावरण में समापन हुआ। सात दिवसीय कथा में बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं ने भाग लेकर ज्ञानगंगा में गोता लगाया।
इस पुण्य आयोजन के मनोरथी श्रीमती गीतादेवी गजानंद कंसल एवं कंसल परिवार रहे। राकेश कंसल एवं प्रमोद कंसल ने परिवार सहित व्यासपूजन किया।
कथा के दौरान व्यासपीठ से परम गौ उपासक, वेदज्ञ एवं करुणामयअनंत श्रीविभूषित श्रीमज्जगद्गुरु द्वाराचार्य अग्रपीठाधीश्वर एवं मलूकपीठाधीश्वर स्वामी डॉ. श्री राजेंद्र दास देवाचार्य जी महाराज(श्री रैवासा-वृंदावन धाम) ने श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया।
कथा के अंतिम दिन महाराजजी ने कहा कि सत्संग और भगवत स्मरण ही मानव जीवन का परम फल है। इस मृत्युलोक में कब किसे जाना पड़े, कहा नहीं जा सकता, इसलिए मनुष्य को सदैव सजग रहते हुए शरीर के माध्यम से संसार की सेवा करनी चाहिए और अंतःकरण में निरंतर भगवत स्मृति बनाए रखनी चाहिए।उन्होंने कहा कि मनुष्य को विद्या और धन का अर्जन अजर-अमर मानकर करना चाहिए, किंतु भगवत भजन और धर्म के कार्य व्याकुल हृदय से करने चाहिए। मानव शरीर की तुलना नदी किनारे खड़े वृक्ष से करते हुए महाराजजी ने कहा कि जिस प्रकार अचानक तेज धारा वृक्ष को अपने में समाहित कर लेती है, उसी प्रकार जीवन भी क्षणभंगुर है। इसलिए बाल्यावस्था से अंतिम श्वास तक भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए।महाराजजी ने चार आश्रम—ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास—का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन काल में औसत आयु 100 वर्ष मानी जाती थी, जबकि आज की परिस्थितियों में जीवन को लगभग 80 वर्ष मानकर उसका नियोजन करना चाहिए और उसके पश्चात का जीवन पूर्णतः प्रभु को समर्पित होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जैसा आचरण आज किया जाएगा, वैसा ही आचरण आने वाली पीढ़ियां अपनाएंगी। युवाओं को अपने माता-पिता के संस्कारों का अनुसरण करना चाहिए। महाराजजी ने यह भी बताया कि पुराणों में तीन प्रकार के नाम—स्वयं का नाम, गुरुदेव का नाम और अत्यंत कृपण व्यक्ति का नाम—सीधे लेने को वर्जित बताया गया है।
प्रवचन में उन्होंने भगवान श्रीराम एवं श्रीकृष्ण के प्रिय परोपकारी जीवन का संदेश देते हुए सभी प्राणियों के प्रति प्रेम, सेवा और हितभाव रखने की प्रेरणा दी। पारिवारिक मर्यादाओं पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि माता-पिता, पति-पत्नी एवं गुरु के नाम सीधे न लेने की परंपरा भारतीय संस्कृति की गरिमा को दर्शाती है।

कथा के समापन पर श्रद्धालु महाराजजी के उपदेशों से भावविभोर नजर आए।
प्रमोद कंसल एवं मीडिया प्रभारी सज्जन महर्षि ने बताया कि इस अवसर पर सुरेश शोमासहरिया, अरुण पाटोदिया (गोभक्त), श्याम अग्रवाल (फागलवावाले), जयंती भगत (ओम नंदेश्वर गोशाला), अजय शर्मा (गोभक्त), अलथान पीआई बी.डी. चौहान, विनय अग्रवाल, योगेश गढ़वी, अनिल अग्रवाल, नवीन अग्रवाल (रचना ग्रुप), विप्र फाउंडेशन प्रमुख घनश्याम सेवग, मीठालाल पालीवाल, संदीप पोद्दार, श्रवण बजाज, रामावतार मिश्रा, विपिन जालान, अर्जुन तिवारी, रमेश इंदोरिया सहित श्री केशरीनंदन सुंदरकांड मंडल व श्री मॉडल टाउन मानस मंडल के सदस्यों ने महाराजजी का अभिवादन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।




