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संसार में वास्तविक प्रेम नहीं, यहां वासनाओं की पूर्ति के लिए प्रेम का अभिनय करते हैं लोग : स्वामी डॉ. राजेंद्र दास देवाचार्य

सूरत।आस्तिक-धार्मिक नगरी सूरत के वेसू क्षेत्र स्थित वीआईपी रोड पर श्री कामधेनु मंडपम में, श्री जड़खोर गोधाम गौशाला में सेवित गोवंश के संरक्षण एवं सेवा के पावन उद्देश्य से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी श्रद्धालु ज्ञानगंगा में गोता लगा रहे हैं।इस पुण्य आयोजन के मनोरथी श्रीमती गीतादेवी गजानंद कंसल एवं कंसल परिवार हैं।

कथा के दौरान व्यासपीठ से परम गौ उपासक, करुणामय, वेदज्ञ एवं निर्मल हृदय अनंत श्रीविभूषित
स्वामी डॉ. राजेंद्र दास देवाचार्य
(श्री रैवासा–वृंदावन धाम) ने श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध के 21वें अध्याय में वर्णित भगवान श्रीकृष्ण की लीला-माधुर्य ‘वेणु गीत’ का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया।
महाराजजी ने कहा कि वेणु गीत भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की मधुर धुन और उसके अलौकिक प्रभाव का प्रतीक है। इस गीत में वृंदावन की समूची प्रकृति—नदियाँ, वृक्ष, पशु-पक्षी और गोपियाँ—कृष्ण की बांसुरी के अमृतमय संगीत में तल्लीन हो जाती हैं। यह भक्ति और प्रेम का वह अद्भुत स्वरूप है, जो भगवान और जीव के गहरे आत्मिक संबंध को प्रकट करता है।
उन्होंने बताया कि बांसुरी की मधुर ध्वनि से नदियाँ अपना प्रवाह रोक लेती हैं, पर्वत झुक जाते हैं और मोर आनंद से नृत्य करने लगते हैं। हिरण, गायें और अन्य जीव-जंतु प्रेम में आकंठ डूब जाते हैं तथा गोपियाँ श्रीकृष्ण के अधरों पर विराजमान बांसुरी को देखकर ईर्ष्या करती हैं कि वह उस अमृत का पान कर रही है, जिसके लिए वे स्वयं लालायित रहती हैं।

महाराजजी ने कहा कि संसार में वास्तविक प्रेम दुर्लभ है; अधिकांश लोग अपनी वासनाओं की पूर्ति के लिए प्रेम का अभिनय करते हैं। सच्चा प्रेम वही है जो सुख देने वाला हो और वह केवल भगवान एवं उनके भक्तों के बीच ही संभव है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जो भक्त मुक्ति चाहता है, भगवान उसे सहज ही प्रदान कर देते हैं, पर जो भक्ति की याचना करता है, उसके प्रेम में भगवान स्वयं बंध जाते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि अहंकार के शून्य होने पर ही प्रेम प्रकट होता है। भगवान श्रीकृष्ण और श्री राधारानी स्वयं प्रेम के साक्षात स्वरूप हैं। जिसका प्रत्यक्ष संबंध भगवान से जुड़ जाता है, वही सच्चा प्रेम कहलाता है। प्रवचन के दौरान कथा स्थल भक्तिरस से ओत-प्रोत रहा और श्रद्धालु भावविभोर होकर भक्ति में लीन दिखाई दिए।

कथा के पंचम दिवस व्यासपीठ से महाराजजी ने श्री रैवासाधाम की महिमा का विस्तार से वर्णन करते हुए सूरत के समस्त गोभक्तों की गोसेवा की मुक्तकंठ से सराहना की।
उन्होंने कहा कि सूरत ऐसा विशिष्ट नगर है, जहां से प्रतिवर्ष श्री जड़खोर गोधाम गोशाला (श्री रैवासाधाम) के लिए नियमित रूप से गोसेवा की राशि भेजी जाती है। भगवान के कार्य भगवान की कृपा से ही संपन्न होते हैं और प्रभु मानव को केवल निमित्त मात्र बनाते हैं, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा कार्य अवश्य करना चाहिए।


महाराजजी ने यह भी कहा कि जानकीनाथजी स्वयं प्रकट हुए हैं और पिछले 750 वर्षों से आज भी विराजमान हैं। कथा के दौरान जैसे ही
“श्री विट्ठलनाथ दया के सागर, अपने अमृत श्री विट्ठल प्रकटे…”
भजन का गायन हुआ, समस्त श्रद्धालु भाव-विभोर होकर भक्ति में लीन हो गए और नृत्य करने लगे। कथा स्थल पर भक्तिरस और गोसेवा के प्रति समर्पण का अद्भुत वातावरण देखने को मिला।
प्रमोद कंसल एवं मीडिया प्रभारी सज्जन महर्षि ने बताया कि शुक्रवार को शहर पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत, नन्दकिशोर शर्मा (गुजरात प्रांत सह संपर्क प्रमुख), राजकुमार जिंदल, जय प्रकाश अग्रवाल (रचना ग्रुप), सुरेश अग्रवाल (रुपा डाइंग), श्री नारायण पेड़ीवाल, कमल किशोर मालोदिया, अशोक बिदासरिया, राजकिशोर शर्मा, अमीलाल भट्ट, आनंद खेतान, डॉ. मिहिरभाई, डॉ. अमितभाई, विनोद बजाज, धर्मेश पटेल (जीवनलीला ग्रुप), मनीष पटेल सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने महाराजजी का अभिवादन कर आशीर्वाद लिया।
मंच संचालन महेश शर्मा (पत्रकार) एवं योगेन्द्र शर्मा ने किया।

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