जन्म सबसे बड़ा रोग है, मुक्ति तक इसका अंत नहीं होता : आचार्य पद्मदर्शनसूरिजी

सूरत।टीमलियावाड़ स्थित अरिहंत वासुपूज्यस्वामी श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन संघ में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैनाचार्य पूज्य पद्मदर्शनसूरिजी महाराज ने गहन आध्यात्मिक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि “जन्म जैसा कोई रोग नहीं है।” कैंसर, किडनी फेल, पैरालिसिस जैसे रोग भी व्यक्ति के मृत्यु के साथ समाप्त हो जाते हैं, लेकिन जब तक आत्मा मुक्ति की मंज़िल तक नहीं पहुँचती, तब तक जन्म नामक रोग समाप्त नहीं होता।
उन्होंने कहा कि डायबिटीज़ जैसे रोग मृत्यु के बाद खत्म हो जाते हैं, लेकिन जन्म–मरण का बंधन सबसे खतरनाक जंजाल है। साधना का उद्देश्य जन्म लेकर अजन्मा बनने का प्रयास होना चाहिए। संसार में जन्म, जीवन और मृत्यु की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है, लेकिन जन्म के बाद जीवन कैसे जीना है, यह हर व्यक्ति को स्वयं तय करना होता है।
पूज्यश्री ने कहा कि सुख के पीछे अंधाधुंध भागकर जीवन को बर्बाद नहीं करना चाहिए। जीवन को वसंत बनाना है या उजाड़, यह हमारे हाथ में है। जीवन को वसंतमय बनाना हो तो संतों के चरणों में जीवन समर्पित करना होगा। भौतिकवाद, भोगवाद और यंत्रवाद का अंधा अनुकरण जीवन को कचरे का ढेर बना देता है। जहां संतों का आगमन होता है, वहां जीवन नंदनवन समान बन जाता है।
उन्होंने कहा, “जो सत्य की शरण में ले जाए वही संत है।” संतों के सान्निध्य से असत्य और असदाचार स्वतः ही छूटने लगते हैं, क्योंकि संतों के पास एक विशेष पवित्र ऊर्जा होती है।
आचार्यश्री ने वर्तमान समाज की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज हर ओर शराब, दुराचार और नशे की लत बढ़ती जा रही है, जिसके कारण पारिवारिक, सामाजिक और आपराधिक घटनाओं में भारी वृद्धि हो रही है। परिवारों में संघर्ष और तनाव बढ़ रहा है। समाज में ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जिनके कारण समाज के अग्रणी लोगों को भी शर्म से सिर झुकाना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि यदि प्रत्येक समाज के श्रेष्ठजन, अग्रणी लोग और सच्चे संत संगठित होकर कार्य करें, तो निश्चित रूप से सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। संतबल और समाजबल अत्यंत शक्तिशाली ऊर्जा है, और यदि इस शक्ति का सदुपयोग करना आ जाए, तो जीवन की सभी समस्याओं का समाधान संभव है।
पूज्य पद्मदर्शनसूरिजी महाराज 19 जनवरी से 1 फरवरी तक पाल क्षेत्र स्थित आचार्य ओंकारसूरिजी आराधना भवन में स्थिरता करेंगे।




