-बहुश्रुत की पर्युपासना जीवन के लिए कल्याणकारी : शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण
बोरावड़ में वर्धमान महोत्सव सुसम्पन्न कर गतिमान हुए ज्योतिचरण

-12 कि.मी. का विहार कर शांतिदूत पहुंचे मनाना गांव
-राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय पूज्यचरणों से बना पावन-विद्यालय के प्रिंसिपल आदि ने स्वागत में दी भावनाओं को अभिव्यक्ति
18.01.2026, रविवार, मनाना, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) :बोरावड़ की धरा पर त्रिदिवसीय वर्धमान महोत्सव सुसम्पन्न कर रविवार को प्रातःकाल की मंगल बेला में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के बोरावड़ से गतिमान हुए। मकर संक्रान्ति के बाद अब धीरे-धीरे ही सही सर्दी ने अपनी चादर समेटनी प्रारम्भ कर दी है। हालांकि अभी भी सुबह-सुबह ठंड का व्यापक प्रभाव दिखाई दे रहा है। मौसम की अनुकूलता-प्रतिकूलता से अप्रभावित युगप्रधान आचार्यश्री जनकल्याण के लिए निरंतर गतिमान हैं। मार्ग के जगह-जगह पर उपस्थित लोगों ने आचार्यश्री को वंदन कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्यश्री लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर आचार्यश्री मनाना गांव में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे।

विद्यालय परिसर में आयोजित मंगल प्रवचन कार्यक्रम में उपस्थित जनता को युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि साधुपन का जीवन एक ऐसा जीवन होता है, जिसकी आराधना कर आदमी इहलोह हित भी साध सकता है, परलोक हित भी साध सकता है और सुगति को प्राप्त हो सकता है। श्रामण्य के लिए ज्ञान की आवश्यकता होती है। धर्म को जीवन में उतारने के लिए धर्म के संबंध में कुछ ज्ञान भी हो तो धर्म को जीवन में उतारा जा सकता है।
ज्ञान प्राप्ति के लिए आदमी को बहुश्रुत की पर्युपासना करने का प्रयास करना चाहिए। बहुश्रुत व्यक्ति के पास बैठने, सुनने व पूछने से जो उत्तर प्राप्त होगा और उसे आत्मसात किया जाए तो ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। पूरी बात को समझने के लिए कई बार पूछा जा सकता है। तदुपरान्त धर्म को जीवन में उतारकर उस अनुकूल व्यवहार होगा तो इह लोक के हित के साथ-साथ परलोक का भी हित हो सकता है तथा सुगति की प्राप्ति भी हो सकती है। सामान्य तौर कहा भी जाता है कि सत्संग से सुख की प्राप्ति होती है।

साधु की संगत, उनकी निकट उपासना थोड़े के समय के लिए भी हो जाए तो अच्छा सन्मार्ग प्राप्त हो सकता है। साधु की प्रेरणा से जीवन की कोई बुरी आदत छुट सकती है। कोई ऐसी बात भी मिल सकती है, जिससे किसी समस्या का समाधान हो सकता है। ज्ञानी संतों का गांव में आगमन हो और सत्संगति का अवसर मिले तो साधुओं से सद्ज्ञान ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने आगे कहा कि आज हमारा बोरावड़ से मनाना आना हुआ है। यहां के लोगों में त्याग-संयम की भावना हो, मानव जीवन का लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए। अहिंसा, ईमानदारी के मार्ग पर चलने का प्रयास करे, यह काम्य है।मनाना स्कूल के प्रिंसिपल श्री सोनारामजी, श्री बजरंगलाल व्यास व वरिष्ठ अध्यापिका श्रीमती जनक कंवर ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी




