तारवाड़ी में पावन उल्लास के साथ मनाया गया भगवान श्री पार्श्वनाथ का जन्म कल्याणक

तारवाड़ी स्थित श्री धरनीधर पार्श्वनाथ जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ में पूज्य आचार्यप्रवर श्री पद्मदर्शनसूरिजी महाराज की पावन निश्रा में कलिकाल कल्पतरु, प्रकट प्रभावी भगवान श्री पार्श्वनाथ प्रभु के जन्म कल्याणक का भव्य एवं हर्षोल्लासपूर्ण आयोजन किया गया। चतुर्विध संघ की उपस्थिति में संगीत की मधुर धुनों के साथ श्रद्धालु भक्ति-भाव में सराबोर हो उठे।
“एक जन्म्यो राजदुलारो, दुनियानो तारणहारो” के गगनभेदी नाद से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया।
जन्म कल्याणक के उपलक्ष्य में छप्पन दिग्कुमारियों सहित भव्यातिभव्य स्नात्र महोत्सव का विशेष आयोजन किया गया। इस पावन अवसर पर पूज्य आचार्य श्री पद्मदर्शनसूरिजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान श्री पार्श्वनाथ का जन्म काशी देश की वाराणसी नगरी में हुआ था, परंतु वास्तविक जन्म तब होता है जब प्रभु हमारे हृदय में अवतरित हों।
उन्होंने कहा, “प्रभु को केवल होंठों पर नहीं, बल्कि हृदय में विराजमान करना चाहिए। जब तक भीतर के दोषों का कचरा साफ नहीं होगा, तब तक प्रभु का जन्म मन-मंदिर में संभव नहीं है। भीतर की शुद्धि के बाद ही प्रभु का प्रतिष्ठान होता है।”
आचार्यश्री ने आगे बताया कि मनुष्य भव हमें आंतरिक दोषों की सफाई के लिए मिला है, न कि केवल भोग-विलास के लिए। समता और समाधि के मूल मंत्र को समझे बिना परमात्मा का अवतरण संभव नहीं है। प्रेम, श्रद्धा, शरणागति और समर्पण के भाव से ही प्रभु की प्राप्ति होती है।उन्होंने कहा कि आज मनुष्य प्रेम तो करता है, लेकिन पद, पदार्थ, धन और अपने परिवार से; जबकि समस्त जगत के जीवों के प्रति मैत्रीभाव आवश्यक है। शत्रु से भी प्रेम करने पर ही परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त होता है। विश्व शांति के लिए प्रत्येक रोम-रोम में करुणा और अहिंसा का नाद गूंजना चाहिए।
आचार्यश्री ने भगवान पार्श्वनाथ की महिमा बताते हुए कहा कि जिनके पास पत्थर को पारस और कांच को कंचन बनाने का सामर्थ्य है, ऐसे प्रभु के अनुयायी आज भी पूरे विश्व में असंख्य हैं। भक्तों का अटूट विश्वास ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। आज भी पाश्र्वनाथ प्रभु के चमत्कार घटित होते हैं और उनका सच्चा भक्त सदैव निर्भीक रहता है।




