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मानव के भीतर है भावों का जगत : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

11वें अनुशास्ता का आद्य अनुशास्ता की महाप्रयाण स्थली में प्रवास का दूसरा दिन

-साध्वी ज्ञानवतीजी (लाडनूं) की स्मृतिसभा का हुआ आयोजन-सिरियारी के श्रद्धालुओं ने दी भावनाओं की अभिव्यक्ति

13.12.2025, शनिवार, सिरियारी, पाली (राजस्थान) :जन-जन के मानस में मानवता की ज्योति जगाने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ‘आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष’ के अंतर्गत तेरापंथ की स्थापना आदि से जुड़े सभी महत्त्वपूर्ण स्थलों को आध्यात्मिक ऊर्जा से स्पंदित करने के उपरान्त द्विदिवसीय प्रवास के लिए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक, महामना आचार्यश्री भिक्षु की महाप्रयाण स्थली सिरियारी में विराजमान हैं।

शनिवार को समाधि स्थल परिसर में बने भव्य ‘भिक्षु समवसरण’ में उपस्थित जनता को आचार्यश्री भिक्षु के परंपर पट्टधर, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन पाथेय प्रदान करते कहा कि मनुष्य अनेक चित्तों वाला होता है। प्रत्येक मानव के भीतर एक भावों का जगत है। आदमी कभी गुस्से में आ जाता है, कभी वह क्षमाशील नजर आता है, कभी वह अहंकार की भाषा बोलता है तो कभी अहंकारमुक्त वाणी बोलता है। कभी वह लोभ के वशीभूत देखा जा सकता है तो कभी वह त्याग के विचारों से ओतप्रोत दिखाई देता है। कभी छल-कपट के भाव से भरा हुआ होता है तो कभी ऋजुता का भाव भी दिखाई देता है। इस प्रकार अनेक विपरित भाव एक ही आदमी में देखे जा सकते हैं।

आचार्यश्री भिक्षु का तीन सौवां जन्म वर्ष चल रहा है। वे भगवान महावीर की परंपरा के आचार्य थे। वे हमारे धर्मसंघ के प्रथम आचार्य थे। इस बार कंटालिया में सिरियारी से ज्यादा रहने का कहा गया है। उनकी माताश्री को सिंह का स्वप्न आया था। माता दीपांबाई को सिंह का स्वप्न आया था। उनके जीवन में साहस और निर्भीकता बहुत अच्छी थी। वे कठिनाइयों में आगे बढ़ते रहे। आचार्यश्री भिक्षु स्वामी की ज्ञान चेतना भी विशिष्ट दी। प्रतिभा, प्रज्ञा के भी वे धनी थे। जिनवाणी के प्रति उनमें भक्ति की भावना थी। इस सिरियारी धाम में दो दिनों के लिए हमारा आगमन हुआ है। हमारे आद्य अनुशास्ता का स्मरण, स्तवन भी करते हैं। यहां से धर्म की प्रेरणा मिलती रहे और अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ते रहें।

आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में साध्वी ज्ञानवतीजी (लाडनूं) की स्मृतिसभा का आयोजन किया गया। आचार्यश्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रदान करते हुए उनकी आत्मा के ऊर्ध्वागमन के लिए आध्यात्मिक मंगलकामना की। तदुपरान्त चतुर्विध धर्मसंघ ने आचार्यश्री के साथ लोगस्स का ध्यान किया।

साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी, मुख्यमुनिश्री महावीरकुमारजी ने भी उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण की कामना की। साध्वी श्रुतयशाजी ने इस संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने बाबा भिक्षु की स्तवना में गीत का आंशिक संगान किया। मुनि गिरिशकुमारजी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तदुपरान्त सिरियारी में विराजमान संतवृंद ने सामूहिक रूप में गीत का संगान कर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी। मुनि चेतनकुमारजी व मुनि धर्मेशकुमारजी ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।

श्री विजय नाहर ने स्वयं द्वारा लिखित पुस्तक ‘इतिहास एवं विरासत’ को सिरियारी संस्थान के पदाधिकारियों के साथ आचार्यश्री के साथ लोकार्पित की। आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। सिरियारी संस्थान के मंत्री श्री मर्यादा कोठारी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री भिक्षु समाधि स्थल संस्थान, सिरियारी द्वारा सामूहिक गीत का संगान किया।

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