**अरावली पर्वतमाला की ऊँचाई-आधारित परिभाषा पर आपत्ति
राष्ट्रपति के नाम सूरत कलेक्टर को सौंपा गया ज्ञापन**

सूरत।
अरावली पर्वतमाला को केवल 100 मीटर की ऊँचाई के मानदंड पर परिभाषित किए जाने की हालिया व्याख्या पर गंभीर आपत्ति जताते हुए इसे एक सतत भू-वैज्ञानिक एवं पारिस्थितिक प्रणाली के रूप में संरक्षित रखने की मांग को लेकर सूरत कलेक्टर को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपा गया।
यह आवेदन विश्वनाथ पचेरीया के नेतृत्व में दिया गया, जिसमें अतुल मोहता, मदन सिहाग, अमित कांकरिया, श्रवण राजपुरोहित, मुकेश जैन, राकेश जैन, दीनदयाल सैन सहित बड़ी संख्या में पर्यावरण-सचेत नागरिक उपस्थित रहे।
इस अवसर पर अतुल मोहता ने कहा कि अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है और यह केवल ऊँचे पर्वतों तक सीमित नहीं, बल्कि निम्न पहाड़ियाँ, रिज क्षेत्र, वन, जलस्रोत, नदियाँ, भूजल पुनर्भरण क्षेत्र, वन्यजीव गलियारे तथा उत्तर भारत की जलवायु को संतुलित करने वाले प्राकृतिक तंत्रों का समग्र समूह है। करोड़ों वर्षों में विकसित इस प्रणाली को केवल संख्यात्मक ऊँचाई के आधार पर परिभाषित करना इसके पारिस्थितिक अस्तित्व की अनदेखी है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2002 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अरावली को पर्वतों की एक श्रृंखला के रूप में मान्यता देते हुए खनन पर प्रतिबंध लगाया था, ताकि इस नाजुक पारिस्थितिकी की रक्षा की जा सके। यह संरक्षण भू-वैज्ञानिक और पारिस्थितिक निरंतरता पर आधारित था, न कि किसी मनमाने ऊँचाई मानदंड पर। केवल ऊँचाई आधारित परिभाषा अरावली के बड़े हिस्से को संरक्षण से बाहर कर देगी।
ज्ञापन में चेताया गया कि इस प्रकार की पुनर्परिभाषा से खनन, वनों की कटाई, अनियंत्रित निर्माण और भूमि उपयोग परिवर्तन को वैधता मिल सकती है, जिससे अपूरणीय पर्यावरणीय क्षति होगी। इसके परिणामस्वरूप नागरिकों को जल संकट, प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, वहीं राष्ट्र को भूजल क्षय, मरुस्थलीकरण, जैव विविधता ह्रास और जलवायु अस्थिरता जैसी गंभीर चुनौतियाँ झेलनी पड़ेंगी।
ज्ञापन के माध्यम से राष्ट्रपति से आग्रह किया गया कि अरावली पर्वतमाला को उसकी समग्र पारिस्थितिक निरंतरता के आधार पर संरक्षित रखा जाए और ऊँचाई-आधारित संकीर्ण परिभाषा को निरस्त किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस प्राकृतिक धरोहर को सुरक्षित रखा जा सके।




