अहमदबादराजस्थानसामाजिक/ धार्मिक

-ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप हैं मोक्ष के मार्ग : युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण

उदयपुर में उदित हुए तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य महाश्रमण

-भव्य स्वागत जुलूस संग उदयपुरवासियों ने अपने आराध्य का किया अभिनंदन

-14 कि.मी. का विहार कर बालीचा के प्रगति आश्रम पहुंचे शांतिदूत

-उदयपुरवासियों ने अपने आराध्य की अभिवंदना में दी भावनाओं को अभिव्यक्ति

-आचार्यश्री ने किया सान्ध्यकालीन विहार, रात्रि प्रवास हेतु पधारे तुलसी निकेतन विद्यालय

24.11.2025, सोमवार, बलीचा, उदयपुर (राजस्थान) :अहमदाबाद में वर्ष 2025 का चतुर्मास सुसम्पन्न करने के उपरान्त जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, अखण्ड परिव्राजक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल प्रस्थान किया। गुजरात की सीमा को अतिक्रान्त कर आचार्यश्री वीरों की धरती राजस्थान के उस क्षेत्र में गतिमान हुई, जिसे वीरता में भी शिरमौर कहा जा सकता है- वह थी मेवाड़ की धरा। अरावली पर्वतशृंखला के आसपास बसी यह धरा ज्योतिचरण से स्पर्श से आलोकित हो उठी।

महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने श्रद्धालुओं पर विशेष अनुग्रह बरसाते हुए पहाड़ी आरोहों व अवरोहों की परवाह किए बिना प्रलम्ब विहार करते हुए झीलों की नगरी उदयपुर की ओर गतिमान थे। सोमवार को उदयपुरवासियों की मानों वह प्रतीक्षा पूर्ण हुई, जब महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ उदयपुर नगर की सीमा में मंगल प्रवेश किया।

सोमवार को काया में ‘पीएम श्री योजना’ के अंतर्गत बने वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, काया से गतिमान हुए। पहाड़ों से छनकर आने वाली सूर्य किरणें थोड़ी अलसाई हुई-सी प्रतीत हो रही थीं, किन्तु महातपस्वी के गतिमान चरण आध्यात्मिक ऊर्जा भरे हुए थे। आज उदयपुरवासी का मानों भाग्योदय हो रहा था। उदयपुर की धरा पर तेरापंथ के महासूर्य के उदय का अवसर उदयपुरवासियों में उत्साह, उमंग व आस्था का संचार कर रहा था। जैसे-जैसे आचार्यश्री उदयपुर की सीमा के निकट होते जा रहे थे, श्रद्धालुओं का उमंग व संख्या दोनों बढ़ती जा रही थी।

तेरापंथ धर्मसंघ के देदीप्यमान महासूर्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी धवल रश्मियों के साथ जैसे ही उदयपुर नगर की सीमा में मंगल प्रवेश किया, पूरा वातावरण बुलंद जयघोष से गुंजायमान हो उठा। हजारों की संख्या में श्रद्धालु अपने आराध्य की अभिवंदना में अपनी प्रणति अर्पित कर रहे थे। उदयपुर में मानों आज दो सूर्यों के प्रकाश से देदीप्यमान बना हुआ था। स्वागत जुलूस के साथ महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी उदयपुर के उपनगर बलीचा के प्रगति आश्रम में पधारे।

वहां से कुछ दूरी पर स्थित मारवल वाटर पार्क में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित जनता को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी अमृतवाणी का रसपान कराते हुए कहा कि ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप को मोक्ष का मार्ग बताया गया है। इसलिए मोक्ष मार्ग को चतुर्गींण बताया गया है। आदमी को सम्यक् ज्ञान उपलब्ध हो जाता है तो सम्यक् चारित्र का मार्ग भी प्रशस्त हो सकता है। आदमी कोई भी कार्य करे, उस कार्य की सम्यक् जानकारी होती है तो कार्य सकुशल संपादित अथवा संपन्न किया जा सकता है। व्यवहार के क्षेत्र में भी किसी कार्य को सुसम्पन्न करने के लिए उस कार्य का ज्ञान होना आवश्यक होता है। उसी प्रकार आदमी पहले ज्ञान करे, फिर उसका आचरण करे। जो पहले अहिंसा की जानकारी कर लेता है, वहीं अहिंसा का सम्यक् पालन कर सकता है। अज्ञान को एक प्रकार का अभिशाप अथवा अंधकार भी कहा जा सकता है। अज्ञान तो मानों सभी पापों से ज्यादा खराब है। अज्ञानता के आवरण के कारण आदमी करणीय-अकरणीय का बोध ही नहीं कर पाता। इसलिए अज्ञानता को दूर कर ज्ञान के क्षेत्र में विकास करना चाहिए। ज्ञान को आचार का योग मिल जाए तो कार्य की अच्छी सम्पन्नता हो सकती है। सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र हो तो भी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से कितने-कितने विषयों की जानकारी प्राप्त हो सकती है। कितने-कितने ग्रंथ हैं। आदमी को जितना समय मिले आदमी को उनका अध्ययन करने का प्रयास करना चाहिए। ग्रंथ इतना ज्यादा होता है कि सभी ग्रंथ को पढ़ने का समय नहीं होता तो आदमी को सारभूत ज्ञान को ग्रहण कर लेने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान के प्रति मन में सम्मान का भाव होना चाहिए। ज्ञान देने वाले के प्रति भी सम्मान का भाव होना चाहिए। स्वाध्याय करने से चित्त निर्मल हो सकता है। आदमी को ज्ञान प्राप्ति के लिए सद्प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री ने आगे कहा कि वर्तमान में तेरापंथ धर्मसंघ के प्रणेता आचार्यश्री भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष चल रहा है। आचार्यश्री तुलसी के दीक्षा के सौ वर्ष पूर्ण होने वाले हैं। इसमें भी आदमी को विभिन्न माध्यमों से ज्ञान अर्जन का प्रयास होना चाहिए। चलते-चलते उदयपुर आना हो गया है। यहां की जनता में खूब धार्मिक चेतना रहे।

आचार्यश्री के स्वागत में श्री शांतिलाल सिंघवी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी। उदयपुर तेरापंथ समाज ने स्वागत गीत का संगान किया। श्री जीवनसिंह पोखरणा, तेरापंथी सभा-उदयपुर के अध्यक्ष श्री कमल नाहटा ने भी अपनी भावाभिव्यक्ति दी।थोड़ी देर पश्चात ही आचार्यश्री ने सान्ध्यकालीन विहार किया और अपनी धवल सेना के साथ रात्रिकालीन प्रवास हेतु तुलसी निकेतन विद्यालय में पधारे।

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