इन्द्रियों का संयम करे मानव : मानवता के मसीहा महाश्रमण
अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह : दूसरा दिन अहिंसा दिवस के रूप में समायोजित

-अहिंसा की भावना रहे पुष्ट : अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमण
-पूर्व न्यायाधीश ने किए आचार्यश्री के दर्शन, दी भावनाओं को अभिव्यक्ति
02.10.2025, गुरुवार, कोबा, गांधीनगर।अहमदाबादवासियों पर विशेष कृपा करते हुए जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता,भगवान महावीर के प्रतिनिधि,अहिंसा यात्रा के प्रणेता,युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने वर्ष 2025 का चतुर्मास कोबा में स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में करना स्वीकार किया था आचार्यश्री ने वर्ष 2025 का चतुर्मास कोबा स्थित प्रेक्षा विश्व भारती में करने के लिए 6 जुलाई को महामंगल प्रवेश किया था। अब धीरे-धीरे चतुर्मास सुसम्पन्नता की ओर है। यहां से आचार्यश्री आगामी 6 नवम्बर को ही मंगल प्रस्थान करेंगे तथा छोटी खाटू में वर्ष 2026 का मर्यादा महोत्सव करने के उपरान्त लाडनूं में स्थित जैन विश्व भारती में एक वर्ष से अधिक समय के लिए योगक्षेम वर्ष के लिए महामंगल प्रवेश करेंगे।

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में एक अक्टूबर से अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह का क्रम प्रारम्भ हो चुका है। गुरुवार को अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अंतर्गत द्वितीय दिवस था, जो अहिंसा दिवस के रूप में समायोजित हुआ।
वीर भिक्षु समवसरण में उपस्थित श्रद्धालुओं को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि आयारो आगम में शरीर के संदर्भ में बताया गया है कि हमारे शरीर में अनेकानेक छिद्र हैं, जिनसे पदार्थ निकलते हैं। शरीर को तीन भागों में बांटें तो ऊपरी भाग, मध्यवर्ती भाग और अधो भाग। ध्यान की दृष्टि से आदमी ऊपरी, मध्य व अधो भाव में ध्यान को ले जाने का अभ्यास किया जा सकता है। इन्द्रियों का एक अर्थ स्रोत है।

इन्द्रिय विषयों के सेवन में जो अंग काम आते हैं, वे अंग ही स्रोत हैं। शरीर में नौ और बारह स्रोत भी बताए गए हैं। मुख भी एक स्रोत है। मुख से थूक भी निकलता है और कफ भी निकलता है। कानों से भी गंदगी निकलती है। दोनों नाकों की छिद्रों से गंदगी निकलती है। और भी शरीर के अंग से हैं, जहां से पदार्थ बाहर निकलते हैं। इससे आदमी को यह सोचना चाहिए कि वह जिस शरीर से इतना मोह करता है, वह भीतर से कितनी गंदगी से भरा हुआ है। मल,मूत्र आदि-आदि कितनी चीजें निकलती हैं। जिस शरीर को सुन्दर मानकर उसके प्रति आसक्ति की जाती है, उसे अशुचि मानकर उसके प्रति अनासक्ति के भाव को संपुष्ट करने का प्रयास किया जा सकता है। इन स्रोतों के माध्यम से आदमी कहीं आसक्ति में भी जा सकता है। आसक्त आदमी अध्यात्म से दूर हो जाता है। आदमी को इन्द्रियों का संयम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपने पांचों इन्द्रियों का संयम करने का प्रयास करना चाहिए। आदमी इन्द्रियों का प्रयोग करता है तो राग-द्वेष से मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए।

अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के दूसरे दिन को अहिंसा दिवस के रूप में समायोजित किया गया। इस संदर्भ में आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में हाईकोर्ट के पूर्व जज श्री एस.जी. शाह आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित थे। श्री सुधीर मेहता ने जज महोदय का परिचय प्रस्तुत किया। जज महोदय ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी।
तदुपरान्त अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के दूसरे दिन अहिंसा दिवस के संदर्भ में पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आज अहिंसा दिवस है। छोटी-छोटी हिंसा तो आदमी के दैनिक कार्य से जुड़े हुए हो सकते हैं। जितना संभव हो सके, हिंसा का अल्पीकरण करने का प्रयास किया जा सकता है। हिंसा को तीन भागों में बांटा जा सकता है-आरम्भजा, प्रतिरोधजा और संकल्पजा। आरम्भजा और प्रतिरोधजा हिंसा निंदनीय तो नहीं है, किन्तु आदमी को संकल्पजा हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए। गुस्सा, लोभ आदि के वशीभूत होकर वैसी हिंसा से बचने का प्रयास करना चाहिए और अहिंसा का पालन करने का प्रयास करना चाहिए। बिना मतलब एक चींटी, कबूतर व कुत्ते को भी तकलीफ न हो, ऐसा अहिंसा का भाव होना चाहिए।

बालिका काम्या नौलखा ने अपनी प्रस्तुति दी। बेंगलुरु जैन विद्या की ओर से श्री गौतम डोसी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। किडजोन के बच्चे विभिन्न वेशभूषा में आचार्यश्री के समक्ष उपस्थित हुए तो आचार्यश्री ने बच्चों को पावन प्रेरणा प्रदान की।




