अणुव्रत के साथ अस्तित्व को जोड़ें -आचार्य शिवमुनि

सूरत।प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि सारा संसार विषयों की ओर भाग रहा है, यह संसार अनुश्रोत के समान है। नदी जिस दिशा में बह रही है मनुष्य भी उस ओर जा रहा है। जिन्होंने अपना लक्ष्य संयम बना लिया, जो संसार से मुक्त होने की इच्छा रखते हैं वे सदैव प्रवाहों से विमुख प्रस्थान करते हैं। आत्मार्थी ने दिशा आत्मा की ओर मोड़ दी है वह प्रतिश्रोत के समान है।
उन्होंने आगे फरमाया कि आत्मा में अनंत सुख है, किंतु मनुष्य भ्रम के कारण विषयों में सुख ढूंढ रहा है। पुद्गलों, विषयों में सुख ढूंढने वाला व्यक्ति सुखी नहीं हो सकता। जैन श्रावक वह है जो अपनी मर्यादाओं को सीमित करता है। पुण्य कर्म से यदि धन ज्यादा आ जाए तो वह ट्रस्टी की तरह रहता है। पाप रूपी परिग्रह को संवर में बदल देता है तो वह सुखी होता है। जिस परिवार में विवेक, मर्यादा नहीं है वहां क्लेश होते हैं। वहां व्यक्ति आर्त-रौद्र ध्यान में रहते हैं।
साधु चर्या की चर्चा करते हुए फरमाया कि जो साधु आचार क्रिया में परिगामी है उन्हें आवश्यक नियमों का सर्वथा पालना करना चाहिए। प्रायः साधु को लम्बे समय तक एक स्थान पर नहीं रूकना चाहिए किंतु विद्या अध्ययन, ध्यान साधना, सेवा एवं तप आराधना हेतु वह रूक सकता है। साधु को अज्ञात कुल से थोड़ा-थोड़ा आहार लाकर अपनी चर्या का पालन करना चाहिए। साधु को एकांत स्थान में निवास करना चाहिए। शहर में न चर्या का पालन होता है न ध्यान साधना होती है। एकांत जिनको चाहिए उन्हें गांवों में जाना चाहिए। पहले साधु अलग-अलग गांवों में विचरण करते थे।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. का त्रिसूत्री कार्यक्रम है जिसमें जैन धर्म के तीन सिद्धांत प्रमुख है भेद विज्ञान, कर्म सिद्धांत और अनेकांतवाद। इन तीनों को अणुव्रत के साथ जोड़ें तो और अधिक सार्थक सिद्ध होगा। व्यक्ति अस्तित्व को मुख्यता दे, ध्यान अस्तित्व पर रहे।युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘हे प्रभु हम कर रहे हैं प्रार्थना’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आचार्य भगवन के सान्निध्य में मंगल आशीर्वाद एवं अणुव्रत सप्ताह कार्यक्रम के शुभारम्भ हेतु अणुव्रत समिति चलथान के पदाधिकारीगण उपस्थित हुए। अणुव्रत समिति के श्री अर्जुन मेड़तवाल, श्री ज्ञानचन्द दुगड़, श्री संजय बाफना, श्रीमती श्रीपायल चौरड़िया आदि ने अपनी भावनाएं व्यक्त की
विशेष – 21 दिवसीय अनुष्ठान का शुभारम्भ 2 अक्टूबर 2025 से : भगवान महावीर की अंतिम देशना श्री उत्तराध्ययन सूत्र का वांचन 2 अक्टूबर 2025 से शुभारम्भ होने जा रहा है, जिसका वांचन प्रातः 8.30 बजे से युवामनीषी श्री शुभममुनि जी के मुखारविंद से होगा।




