
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार चुनाव से पहले स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर बड़ा आदेश दिया है। अदालत ने आधार कार्ड को पहचान हेतु 12वें दस्तावेज़ के रूप में मान्यता देने का निर्देश दिया है। इस फैसले से बिहार के लाखों मतदाताओं को लाभ मिलेगा, जो अब तक पुराने दस्तावेज़ न होने की वजह से मतदाता सूची में नाम दर्ज नहीं करवा पा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह अपने अधिकारियों को आधार कार्ड को भी पहचान दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार करने की स्पष्ट गाइडलाइन जारी करे।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIR प्रक्रिया में मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए आधार कार्ड को 12वें दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाएगा, लेकिन इसे नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जाएगा। अधिकारियों को यह अधिकार होगा कि वे प्रस्तुत किए गए आधार कार्ड की प्रामाणिकता और वास्तविकता की जांच करें।
चुनाव आयोग ने अदालत में बताया कि अब तक 7.24 करोड़ मतदाताओं में से 99.6% लोगों ने आवश्यक दस्तावेज जमा कर दिए हैं। पूर्व आदेश में 65 लाख मतदाताओं के लिए आधार कार्ड को पहले ही मान्यता दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि सुधारित मतदाता सूची की प्रक्रिया में शामिल या बाहर किए गए लोगों की पहचान स्थापित करने के उद्देश्य से आधार अधिनियम 2016 के तहत जारी आधार कार्ड स्वीकार किए जाएंगे, लेकिन इसे नागरिकता का सबूत नहीं माना जाएगा।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने कहा कि परा-लीगल वॉलंटियर्स की नियुक्ति की जानी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि याचिकाकर्ता ग़ैरक़ानूनी प्रवासियों को शामिल करना चाहते हैं। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत का ऐसा कोई इरादा नहीं है और आधार केवल पहचान का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। उन्होंने कहा कि यदि इसे 12वें दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाता है, तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।इस आदेश से अब बिहार के लाखों मतदाताओं को मतदाता सूची में नाम दर्ज करवाने और पहचान स्थापित करने में सुविधा मिलेगी।




