
12.02.2026, गुरुवार, लाडनूं, डीडवाना-कुचामण (राजस्थान) :लाडनूं के जैन विश्व भारती में विराजमान युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में मानों चतुर्विध धर्मसंघ उमड़ रहा है। बहिर्विहार से लम्बेकाल के उपरान्त गुरु सन्निधि में पहुंचने वाले चारित्रात्माएं गुरुदर्शन से प्राप्त अपने हर्षित भावों को अभिव्यक्ति दे रहे हैं तो वहीं दूर-दूर से गुरुदर्शन को पहुंचने वाले श्रद्धालु भी अपने आराध्य के दर्शन, सेवा उपासना का लाभ प्राप्त कर स्वयं को धन्य-धन्य महसूस कर रहे हैं। सुधर्मा सभा से नित्य प्रति गुरुमुख से प्रवाहित होने वाली ज्ञानगंगा का श्रवण करने के लिए भी श्रद्धालुआंे में मानों विशेष आकर्षण देखने को मिल रहा है।

गुरुवार को सुधर्मा सभा में उपस्थित जनता को महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी ने पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए कहा कि पुरुष अनेक चित्तों वाला होता है। आदमी के मन में भाव उतरते हैं। मन और भाव का संबंध बताया गया है। मन को भावों का ग्राहक बताया गया है। मनुष्य के पांच इन्द्रियों का अपना-अपना व्यापार होता है। कान है, उसका विषय है शब्द और उसकी प्रवृत्ति है सुनना। इसी प्रकार आंख का विषय है रूप और विषय है देखना। इसी प्रकार नाक, जिह्वा और स्पर्श की बात भी होती है। सबके अपने विषय और सबकी अपनी प्रवृत्ति भी होती है। इन पांचों इन्द्रियों को ज्ञानेन्द्रियां कहा जाता है। इसी प्रकार हाथ पैर के रूप में पांच कर्मेन्द्रियां कही जाती हैं। ये प्रवृत्ति के साधन हैं। ज्ञानेन्द्रियां भोग का माध्यम भी बनती हैं और ज्ञान भी प्राप्त होता है। प्रत्येक इन्द्रियां का अपना निर्धारित विषय है और उसके अनुसार उनकी प्रवृत्ति भी होती है। इसी प्रकार चेतना की प्रवृत्ति होती है उपयोग। ज्ञान और दर्शन चेतना की प्रवृत्ति होती है। चेतना की प्रवृत्ति तो सिद्धावस्था में भी होती है।
इन्द्रियों की प्रवृत्ति सशरीर अवस्था में ही होती है। केवलज्ञानियों में अनिन्द्रिय की अवस्था हो जाती है। वहां इन्द्रियों की अपेक्षा नहीं होती। मन के चित्रपट्ट पर अनेक दृश्य उभरते हैं। सुबह कोई और भाव आता है तो शाम होते-होते कुछ और भाव बदल जाता है। एक समय आदमी शांत अवस्था में होता है तो वहीं दूसरे ही क्षण वह अनेक प्रकार की योजनाएं बनाने लगता है। भावों का बदलाव होता रहता है।

आदमी को अनेक चित्तों वाला होने के साथ-साथ किसी विषय पर एकचित्त वाला भी होना चाहिए। धर्म के प्रति आस्था है, इस विषय में आदमी को एकचित्त होना भी अच्छी बात हो सकती है। देव, गुरु और धर्म के प्रति आस्था, समर्पण का भाव है, इसमें आदमी को एकचित्त होना भी अच्छी बात हो सकती है।
आचार्यश्री की सन्निधि में पहुंचने वाले साधु-साध्वियों द्वारा प्रस्तुति अथवा अपने आराध्य के अभिवंदना का दौर अभी भी जारी है। इस क्रम में आज साध्वी प्रतिभाश्रीजी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए सहवर्ती साध्वियों के साथ गीत का संगान किया। साध्वी शशिरेखाजी ने अपने हृदयोद्गार व्यक्त किए। मुनि तन्मयकुमारजी ने भी पूज्यचरणों में अपनी प्रणति गीत के माध्यम से अर्पित की। मुनि यशवंतकुमारजी ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी।



