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एमएसएमई में नियम तो सख़्त बने, लेकिन अमल में ढिलाई

45 दिनों में भुगतान का प्रावधान आज भी काग़ज़ों तक सीमित

सूरत।एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) क्षेत्र को सुरक्षित और अनुशासित बनाने के उद्देश्य से 45 दिनों के भीतर भुगतान करने का नियम बनाया गया है, लेकिन इसका सख़्ती से पालन नहीं होने के कारण यह नियम आज भी व्यवहार में प्रभावी साबित नहीं हो पा रहा है। व्यापारियों का कहना है कि कई मामलों में 200 दिन से अधिक समय बीत जाने के बावजूद भी भुगतान नहीं किया जाता, फिर भी ऐसे व्यापारियों के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।
नियम के अनुसार, यदि एमएसएमई में पंजीकृत किसी व्यापारी से माल की खरीद की जाती है, तो खरीदार को 45 दिनों के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। भुगतान नहीं होने पर शिकायत दर्ज कर कार्रवाई का प्रावधान भी है। हालांकि, वास्तविकता यह है कि नियम तो मौजूद है, लेकिन उसका प्रभावी अमल नहीं होने के कारण भुगतान की समय-सीमा का पालन नहीं किया जाता।
व्यापारियों का यह भी कहना है कि यदि दोनों व्यापारियों में से किसी एक की एमएसएमई में पंजीकरण नहीं है, तो 45 दिनों का नियम लागू ही नहीं होता। इसी वजह से कई व्यापारी जानबूझकर एमएसएमई में पंजीकरण नहीं कराते। जानकारों के अनुसार, जो व्यापारी एमएसएमई में पंजीकरण कराते भी हैं, वे अधिकतर सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का लाभ लेने के उद्देश्य से ही ऐसा करते हैं, न कि समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के लिए।
इसके अलावा, अधिकांश व्यापारी पूरे वित्तीय वर्ष का हिसाब साल के अंत में, यानी 31 मार्च से पहले, समायोजित कर देते हैं। वर्षभर की खरीद का भुगतान एक साथ निपटाने की यह परंपरा भी 45 दिनों के नियम के सख़्त अमल में बाधा बन रही है। जानकारों का मानना है कि यदि 45 दिनों में भुगतान नहीं करने वाले व्यापारियों के खिलाफ तत्काल और कड़ी कार्रवाई का प्रावधान किया जाए, तभी इस नियम का सही अर्थों में पालन संभव हो सकेगा।
कपड़ा उद्योग में भी बने अलग नियम
एमएसएमई नियमों के अलावा, कपड़ा उद्योग से जुड़ी विभिन्न व्यापारिक संस्थाओं ने भी भुगतान अनुशासन बनाए रखने के लिए अपने-अपने नियम बनाए हैं। चूंकि अधिकांश व्यापारी 90 से 120 दिनों में भुगतान करते हैं, इसलिए कई संगठनों ने तय समय में भुगतान नहीं करने वाले व्यापारियों से लेन-देन न करने के नियम लागू किए हैं। बावजूद इसके, इन नियमों का भी प्रभावी अमल नहीं हो पा रहा है।
व्यापारियों का कहना है कि जहां व्यापार में लाभ दिखता है, वहां नियमों को अपनी सुविधा के अनुसार लागू किया जाता है। इसी कारण अलग-अलग नियमों के चलते एकरूपता नहीं बन पा रही है और भुगतान व्यवस्था आज भी अव्यवस्थित बनी हुई है।

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